Considered the cleanest: देशभर में “सबसे साफ शहर” कहलाने वाला इंदौर इन दिनों एक दिल दहला देने वाली त्रासदी के कारण सुर्खियों में है। भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल ने ऐसा कहर बरपाया कि सिर्फ पानी पीने से 10 लोगों की जान चली गई और करीब 1400 लोग बीमार पड़ गए। जिस शहर को स्वच्छता का मॉडल माना जाता रहा, वहीं की लापरवाही ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ सफाई के तमगे ही पर्याप्त हैं? यह हादसा न केवल प्रशासनिक चूक को उजागर करता है, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या हुआ भागीरथपुरा में, कैसे फैला जहर
स्थानीय लोगों के अनुसार कई दिनों से घरों में आ रहा पानी बदबूदार और गंदा था। शिकायतें पार्षद और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचीं, लेकिन समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसी दौरान लोग उल्टी, दस्त और बुखार की चपेट में आने लगे। जांच में सामने आया कि पाइपलाइन में लीकेज के कारण सीवेज और टॉयलेट का गंदा पानी पीने के पानी में मिल गया था। खुदाई के दौरान ड्रेनेज लाइन टूटने और मुख्य सप्लाई लाइन के ऊपर शौचालय बने होने जैसी गंभीर लापरवाहियां उजागर हुईं। लैब रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि दूषित पानी से डायरिया फैला, जिसने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं।
प्रशासन की कार्रवाई, लोगों में गुस्सा और डर
घटना के बाद प्रशासन ने इलाके में साफ पानी की सप्लाई शुरू की और पाइपलाइन की जांच के आदेश दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को पानी उबालकर पीने की सलाह दी है। हालांकि, जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनके लिए ये कदम काफी देर से उठाए गए लगते हैं। छह महीने के मासूम की मौत ने इस त्रासदी को और भयावह बना दिया है। यह हादसा सिर्फ एक इलाके की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की अनदेखी और जवाबदेही की कमी का आईना है। सवाल यही है—अगर समय पर शिकायतों को सुना जाता, तो क्या ये जानें बचाई जा सकती थीं?