Cyber Crime: प्रदेश की राजधानी में साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और हैरानी की बात यह है कि इसके शिकार सिर्फ कम पढ़े-लिखे या तकनीक से अनजान लोग ही नहीं, बल्कि बुजुर्गों के साथ-साथ उच्च शिक्षित, प्रोफेशनल और सरकारी-निजी संस्थानों में कार्यरत लोग भी बड़ी संख्या में फंस रहे हैं। साइबर अपराधियों ने ठगी के तरीके इतने शातिर और तकनीकी बना लिए हैं कि सावधान लोग भी झांसे में आ जा रहे हैं। पुलिस और साइबर सेल के आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक वर्ष में लखनऊ में दर्ज साइबर ठगी की शिकायतों में करीब 30 से 35 प्रतिशत पीड़ित 55 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग हैं, जबकि 40 प्रतिशत से अधिक मामले ऐसे लोगों के हैं जो ग्रेजुएट, पोस्ट-ग्रेजुएट या किसी प्रोफेशनल क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। यह स्थिति बताती है कि साइबर अपराध अब सिर्फ जानकारी की कमी का नहीं, बल्कि भरोसे और मनोवैज्ञानिक दबाव का खेल बन चुका है।
बुजुर्ग क्यों बन रहे आसान निशाना
बुजुर्गों के निशाने पर आने की सबसे बड़ी वजह उनका भावनात्मक स्वभाव और तकनीक पर सीमित पकड़ मानी जा रही है। ठग अक्सर खुद को बैंक अधिकारी, बीमा एजेंट, पेंशन विभाग का कर्मचारी या पुलिस अधिकारी बताकर फोन करते हैं। “आपका खाता बंद हो जाएगा”, “केवाईसी अपडेट नहीं है”, “आपके नाम से गलत लेन-देन हुआ है” जैसे डर पैदा करने वाले शब्दों का इस्तेमाल कर बुजुर्गों को घबरा दिया जाता है। घबराहट में वे ओटीपी, एटीएम विवरण या बैंक से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा कर देते हैं। कई मामलों में ठग बुजुर्गों को वीडियो कॉल पर नकली यूनिफॉर्म या फर्जी आईडी दिखाकर भरोसा भी दिलाते हैं। साइबर सेल के अधिकारियों के मुताबिक अकेले रहने वाले बुजुर्गों में यह खतरा और ज्यादा है, क्योंकि वे तुरंत किसी से सलाह नहीं ले पाते।
पढ़े-लिखे और प्रोफेशनल भी फंस रहे
यह आम धारणा है कि पढ़े-लिखे लोग साइबर ठगी से बच सकते हैं, लेकिन हकीकत इसके उलट है। लखनऊ में दर्ज कई मामलों में इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, बैंककर्मी और आईटी प्रोफेशनल तक ठगी का शिकार हुए हैं। ठग अब साधारण कॉल या मैसेज से आगे बढ़कर फर्जी वेबसाइट, हूबहू बैंक जैसी ई-मेल आईडी, नकली सरकारी नोटिस और निवेश से जुड़े आकर्षक ऑफर भेज रहे हैं। “डिजिटल अरेस्ट”, “फर्जी मनी लॉन्ड्रिंग केस”, “कूरियर में अवैध सामान” जैसे नए हथकंडों में ठग पढ़े-लिखे लोगों को कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर लाखों रुपये ट्रांसफर करा लेते हैं। कई बार ठगी इतनी प्रोफेशनल होती है कि पीड़ित को लंबे समय तक यह एहसास ही नहीं होता कि वह धोखे का शिकार हो चुका है।
आम ठगी के तरीके
लखनऊ में सामने आ रहे साइबर ठगी के प्रमुख तरीकों में फर्जी केवाईसी अपडेट कॉल, ओटीपी फ्रॉड, फर्जी निवेश ऐप, शेयर बाजार में मोटे मुनाफे का लालच, सोशल मीडिया अकाउंट हैक कर पैसे मांगना, क्यूआर कोड स्कैम और फर्जी कस्टमर केयर नंबर शामिल हैं। इसके अलावा हाल के दिनों में “डिजिटल अरेस्ट” और “फर्जी पुलिस या ईडी अधिकारी” बनकर की जा रही ठगी के मामले तेजी से बढ़े हैं।
पुलिस और साइबर सेल की चुनौती
लखनऊ पुलिस का साइबर सेल लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है, लेकिन अपराधियों की रफ्तार और नए तरीकों के आगे यह बड़ी चुनौती बनी हुई है। अधिकारियों का कहना है कि ज्यादातर मामलों में पीड़ित देर से शिकायत दर्ज कराते हैं, जिससे रकम की रिकवरी मुश्किल हो जाती है। कई बुजुर्ग सामाजिक बदनामी या डर के कारण शिकायत करने से भी हिचकते हैं।
क्या है बचाव का तरीका
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे जरूरी है सतर्कता। कोई भी बैंक, पुलिस या सरकारी विभाग फोन पर ओटीपी, पिन या पासवर्ड नहीं मांगता। अनजान कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा न करें और किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले उसकी सच्चाई जांच लें। बुजुर्गों को चाहिए कि किसी भी संदिग्ध कॉल पर परिवार के किसी सदस्य से सलाह जरूर लें। पुलिस का कहना है कि साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं। समय रहते की गई शिकायत से रकम वापस मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
केस 1= विकासनगर में साइबर ठगों ने 75 वर्षीय ऊषा शुक्ला को अपना शिकार बना लिया था। जब वह 1.5 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने बैंक पहुंची तो मैनेजर को शक हुआ और उसने पुलिस को सूचना दी। जिसकी बाद उन्हें बचाया जा सका। ठगों ने उन्हें तीन दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखा था।
केस 2= पीजीआई में 68 वर्षीय बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट कर ठगों ने 2.75 लाख रुपये ऐंठ लिये। जालसाजों ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंस जाने की धमकी देकर रकम ऐंठ ली।
केस 3= गोमतीनगर के वास्तुखंड निवासी रिटायर्ड अफसर राजेंद्र प्रकाश वर्मा को ठगों ने व्हाट्सप कॉल कर खुद को एटीएस अधिकारी बताया था। इसके बाद उन्हें 7 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखने के बाद आतंकी फंडिंग में नाम आने का डर दिखाकर 54.60 लाख रुपये ऐंठ लिये थे। इस मामले में पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
केस 4= डॉ अनुरूपा राय को जालसाजों ने काल कर खुद को सीबीआई अफसर बताया था और फिर उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग केस में जेल में भेजने की धमकी दे 9 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखा। इसके बाद उनसे 13.40 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिये।
कई मामलों में पीड़ितों की रकम वापस लौटवाई गई
डीसीपी, साइबर क्राइम सेल कमलेश दीक्षित ने बताया कि साइबर क्राइम सेल लगातार अपराधियों पर शिकंजा कसने का कार्य कर रही है। लगातार इसकी रोकथाम के लिए होमवर्क किया जा रहा है। अब तक दर्जनों साइबर अपराधियों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है और कई मामलों में पीड़ितों की रकम वापस लौटवाई गई है। जनता को जागरूक करने के साथ ही पुलिस अपना काम कर रही है।