उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी ने एटा और कासगंज में बड़ा संगठनात्मक फैसला लिया है। लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में हुई बैठक के दौरान दो नेताओं के बीच तीखी बहस और कथित तौर पर गाली-गलौज के बाद दोनों जिलों की जिला कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों को भंग कर दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में करीब 250 नेता और पदाधिकारी मौजूद थे। इसके बाद पार्टी ने दोनों जिलों में नए सिरे से संगठन तैयार करने की प्रक्रिया शुरू करने के संकेत दिए हैं।
बैठक में जुगेंद्र और मंजीत के बीच विवाद
19 सितंबर को लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में एटा और कासगंज के नेताओं की बैठक बुलाई गई थी। इसका उद्देश्य संगठन की स्थिति और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा करना था। रिपोर्टों के अनुसार, बैठक के दौरान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह यादव और सपा नेता मंजीत यादव के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते मामला तीखी कहासुनी तक पहुंच गया। मौजूद नेताओं ने माहौल संभालने की कोशिश की, लेकिन विवाद बढ़ गया।
अखिलेश ने जताई नाराजगी, संगठन पर हुआ एक्शन
घटना के बाद अखिलेश यादव ने नेताओं को अनुशासन में रहने की नसीहत दी और बैठक से चले गए। इसके करीब एक घंटे बाद एटा और कासगंज की जिला कार्यकारिणियों को भंग करने का फैसला सामने आया। प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल की ओर से जारी आदेश में दोनों जिलों के जिलाध्यक्ष, जिला कार्यकारिणी और फ्रंटल संगठनों के पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से पदमुक्त किए जाने की जानकारी दी गई।
कौन हैं जुगेंद्र सिंह यादव?
जुगेंद्र सिंह यादव एटा की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वह अलीगंज से सपा के पूर्व विधायक रामेश्वर सिंह यादव के छोटे भाई हैं। स्थानीय राजनीति में उनके परिवार का प्रभाव रहा है और पंचायत स्तर पर भी परिवार की सक्रियता रही है। हालिया बैठक में हुए विवाद के बाद उनका नाम एक बार फिर एटा की सियासत में चर्चा का विषय बना है। हालांकि, बैठक में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों और पार्टी नेतृत्व की नाराजगी के कारणों को लेकर सामने आई कई बातें सूत्रों पर आधारित हैं।
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मंजीत यादव भी राजनीतिक परिवार से
मंजीत यादव भी एटा के एक राजनीतिक परिवार से आते हैं। वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के पूर्व सभापति रमेश यादव के भतीजे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, वह जिला पंचायत सदस्य भी रह चुके हैं और सपा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। बैठक में जुगेंद्र सिंह यादव के साथ उनका विवाद होने के बाद वह भी इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में आ गए।
2027 से पहले संगठन के सामने नई चुनौती
एटा और कासगंज की सभी संगठनात्मक इकाइयों को भंग किए जाने के बाद अब सपा नेतृत्व के सामने दोनों जिलों में नए संगठन के गठन की चुनौती है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह बदलाव स्थानीय सियासत में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है। पार्टी नेतृत्व की ओर से नई इकाइयों के गठन के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि दोनों जिलों में संगठन की जिम्मेदारी किन नेताओं को दी जाती है।