
Brave sons of Noida: सियाचिन ग्लेशियर, दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र, जहां हाड़ कंपाने वाली ठंड और दुश्मन की गोलियों का सामना करने वाले जवान देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर देते हैं। इसी अमर मोर्चे पर 5 अक्टूबर 1998 को शहीद हुए नोएडा के लाल कैप्टन शशिकांत शर्मा की कहानी साहस, त्याग और देशभक्ति की अनुपम मिसाल है। मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्होंने 'बाना' पोस्ट पर दुश्मन की घुसपैठ को नाकाम कर मातृभूमि को सलाम ठोंका। नोएडा शहर में शहीद कैप्टेन शशिकांत शर्मा की स्मृति में स्कूली बच्चों के लिए क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित किया जा रहा है। इस वर्ष इस प्रतियोगिता की सिल्वर जुबली मनाई जा रही है।
आज, जब देश उनके शहादत दिवस की पूर्व संध्या पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, उनकी जीवन गाथा युवाओं को प्रेरित करने वाली एक जीवंत कथा बनी हुई है। कैप्टन शशिकांत शर्मा का जन्म एक सैन्य परिवार में हुआ था, जहां वीरता की हवा में पलने वाले बच्चे स्वाभाविक रूप से देशसेवा के लिए प्रेरित होते हैं। उनके पिता फ्लाइट लेफ्टिनेंट जे.पी. शर्मा भारतीय वायुसेना के अधिकारी थे, जबकि मां सुधेश शर्मा एक गृहिणी। नोएडा के सेक्टर 37 स्थित अरुण विहार में रहने वाले इस परिवार में शशिकांत बचपन से ही पिता के नक्शेकदम पर चलने का सपना देखते थे। 'मैं बड़ा होकर फौज में जाऊंगा और देश की सेवा करूंगा'—यह उनके बचपन की लाइनें थीं, जो बाद में हकीकत बन गईं।
1991 में उन्होंने नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए), खड़कवासला में प्रवेश लिया, जहां उनकी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता ने प्रशिक्षकों को प्रभावित किया। एनडीए से कई सम्मान अर्जित करने के बाद, वे इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए), देहरादून पहुंचे। 1996 में वे 12 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (जेकेएलआई) में कमीशन हुए।
शुरूआती दिनों में वे 15 आर्मर्ड रेजिमेंट (अमृतसर) में तैनात रहे, लेकिन सियाचिन जैसे कठिन मोर्चे की पुकार सुनकर मात्र 22 वर्ष की आयु में उन्होंने स्वेच्छा से स्वैच्छिक स्थानांतरण का अनुरोध किया। यह निर्णय उनके साहस का प्रमाण था—एक नॉन-कॉम्बैट जोन से कॉम्बैट जोन में कूद पड़ना आसान न था।सियाचिन ग्लेशियर, जहां तापमान माइनस 50 डिग्री तक गिर जाता है और ऑक्सीजन की कमी सांस लेना मुश्किल कर देती है, वहां कैप्टन शशिकांत ने सितंबर 1998 में अपनी टुकड़ी के साथ कदम रखा। वे साल्टोरो रिज पर तैनात थे, जो ग्लेशियर के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां दुश्मन की निगरानी और घुसपैठ हमेशा बनी रहती है।
4 अक्टूबर की रात को पाकिस्तानी घुसपैठिए 'बाना' पोस्ट—दुनिया की सबसे ऊंची बसी हुई चौकी (लगभग 21,000 फुट ऊंचाई पर)—पर हमला बोल पड़े। भारी गोलाबारी के बीच कैप्टन शशिकांत ने अपनी टुकड़ी को संभाला और दुश्मन पर जवाबी कार्रवाई का निर्देशन किया।चोट लगने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। घायल अवस्था में भी वे अपने साथियों को प्रेरित करते रहे और पोस्ट की रक्षा करते रहे। लेकिन 5 अक्टूबर की भोर में दुश्मन की एक गोली उनके मस्तक को छू गई। गंभीर रूप से घायल कैप्टन शशिकांत ने अंतिम सांस तक देश की धरती को नमन किया। उनकी शहादत ने न केवल घुसपैठ को विफल किया, बल्कि पूरे सियाचिन मोर्चे पर भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा कर दिया। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत 'सेना मेडल (वीरता)' से सम्मानित किया गया।शहादत के बाद नोएडा में उनका पार्थिव शरीर पहुंचा तो पूरा शहर शोक में डूब गया। उनके छोटे भाई डॉ. नरेश शर्मा, जो आज भी चिकित्सक के रूप में सेवा कर रहे हैं, हर वर्ष सियाचिन जाकर भाई को श्रद्धांजलि देते हैं।
2019 में उन्होंने सितंबर माह में यह यात्रा की, ताकि भाई के बलिदान की कठिनाइयों को महसूस कर सकें। मां सुधेश शर्मा ने एक साक्षात्कार में कहा था, "शशिकांत ने कहा था—अगर मैं लौट आया तो तुम्हारा बेटा रहूंगा, वरना राष्ट्र का बेटा बन जाऊंगा।" यह वाक्य आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय में गूंजता है।नोएडा ने अपने इस वीर पुत्र को कभी नहीं भुलाया। सेक्टर 37 में 'शहीद कैप्टन शशिकांत शर्मा पार्क' उनकी स्मृति में स्थापित है, जहां युवा पीढ़ी उनके चित्र के समक्ष शपथ लेती है। स्कूलों में उनकी कहानी सुनाई जाती है, और सेना के कार्यक्रमों में उनका नाम अमरता का प्रतीक बन चुका है। सियाचिन जैसे मोर्चों पर तैनात जवान आज भी कैप्टन शशिकांत की तरह ही अडिग खड़े हैं, क्योंकि उनकी गाथा सिखाती है—त्याग ही सच्ची विजय है।
नोएडा के निवासी मानव सेवा समिति के बैनर तले वर्ष 2001 से क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित करते हैं। इस वर्ष रजत जयंती वर्ष में नोएडा स्टेडियम में क्रिकेट टूर्नामेंट का शुभारंभ उनके बलिदान दिवस पर शुरू होगा। यह आयोजन 15 अक्टूबर तक चलेगा। नोएडा के सेक्टर 37 मार्ग का नामकरण कैप्टेन शहीद शशिकांत शर्मा के नाम पर है। यहीं एक शशि चौक का प्राधिकरण ने शहीद को समर्पित किया है।