लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) को लेकर सियासी घमासान और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। भाजपा विधायक डॉ. नीरज बोरा के एक विवादास्पद बयान ने सपा को चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का मौका दे दिया है। बोरा ने दावा किया कि लखनऊ उत्तर विधानसभा क्षेत्र में महज एक हफ्ते में 18 हजार नए वोटर जोड़े गए हैं, जिसे सपा ने 'चुनावी धांधली' का सबूत बताते हुए आयोग की भूमिका पर हमला बोला। वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए जांच के आदेश जारी कर दिए हैं, लेकिन यह विवाद विधानसभा चुनावों से पहले सत्ताधारी भाजपा और विपक्ष के बीच नई जंग का रूप ले सकता है।
डॉ. नीरज बोरा, जो लखनऊ उत्तर से भाजपा विधायक हैं, ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि मतदाता सूची से वोट कटने की शिकायतों के बीच उन्होंने खुद 18 हजार वोट बढ़वाने का काम किया है। उन्होंने जोर देकर कहा, वोट कट रहे हैं तो बढ़ भी रहे हैं। हमने हफ्ते भर में ही यह लक्ष्य हासिल किया। यह बयान ऐसे समय आया है जब एसआईआर प्रक्रिया के तहत यूपी में लाखों वोटरों के नाम कटने या जुड़ने की रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं। भाजपा इसे 'सुधार प्रक्रिया' बताती है, लेकिन विपक्ष इसे चुनावी इंजीनियरिंग का हिस्सा मानता है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, भाजपा विधायक का यह दावा साबित करता है कि सत्ता के दम पर मतदाता सूची में हेरफेर हो रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल हैं। क्या यह संस्था भाजपा की कठपुतली बन गई है? सपा ने आयोग से मांग की है कि बोरा के दावे की स्वतंत्र जांच हो और एसआईआर प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए। पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि लखनऊ जैसे शहरी क्षेत्रों में वोटरों के नाम कटने से अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग प्रभावित हो रहे हैं, जो विपक्षी वोट बैंक को कमजोर करने की साजिश है।
चुनाव आयोग ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि लखनऊ उत्तर में 6 जनवरी के बाद केवल 1407 फॉर्म-6 (नए वोटर पंजीकरण) जमा हुए हैं, न कि 18 हजार। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय ने बयान जारी कर आरोपों को भ्रामक बताया और कहा कि एसआईआर प्रक्रिया पारदर्शी है। आयोग ने जिलाधिकारी को जांच के आदेश दिए हैं और कहा कि किसी भी अनियमितता पर सख्त कार्रवाई होगी। हालांकि, आयोग की यह सफाई विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर पाई है।
राजनीतिक विश्लेषक ज्ञानेंद्र शुक्ल का मानना है कि यह विवाद यूपी की सियासत को नई दिशा दे सकता है। भाजपा इसे 'विपक्ष की हताशा' बता रही है, जबकि सपा इसे 'लोकतंत्र की हत्या' का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में सपा विधानसभा में विशेष चर्चा की मांग कर सकती है और यदि जांच में कोई खामी मिली तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकता है। यूपी में एसआईआर प्रक्रिया 15 जनवरी तक चलनी है और इसमें अब तक लाखों नाम जुड़े या कटे हैं, खासकर लखनऊ में जहां सबसे ज्यादा बदलाव रिपोर्ट हुए हैं।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने बोरा के बयान का बचाव करते हुए कहा कि विधायक ने केवल पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत का जिक्र किया है, न कि कोई अनुचित काम। लेकिन सपा इसे चुनावी हथियार बनाने से नहीं चूक रही। कुल मिलाकर, यह रार यूपी की सियासत में नया मोड़ ला सकती है, जहां वोटर सूची अब चुनावी रणनीति का केंद्र बन गई है।