Lucknow News: सूबे की राजनीति, जो हमेशा से ही जाति, धर्म और वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है, अब चुनाव आयोग की एक सामान्य प्रक्रिया को लेकर नया रंग भरने लगी है। यहां 'एसएसआर' का मतलब कोई रहस्यमयी कोड या सियासी संक्षिप्ताक्षर नहीं, बल्कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन है यानी विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण अभियान। यह 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा करने का सरकारी प्रयास है, लेकिन सियासी दलों के लिए यह बहाना बन गया है।
बयानबहादुरों के सियासी बोल
जहां एक तरफ सत्ताधारी भाजपा इसे 'लोकतंत्र की मजबूती' का हथियार बता रही है, वहीं विपक्ष इसे 'वोटरों को मिटाने की साजिश' करार दे रहा। नतीजा रोजाना नई बयानबाजी, सोशल मीडिया पर तीखे हमले और हर नेता की नजर 2027 के चुनावी समीकरणों पर। एसआईआर के बहाने उभरती राजनीतिक रणनीतियों, बयानवीर नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और यूपी की सियासत के नए रंगों को खंगालता है। एसआइआर अभियान नवंबर 2025 से शुरू हुआ, जिसका मकसद वोटर लिस्ट से फर्जी, मृत या डुप्लिकेट नाम हटाना है। चुनाव आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और बयां कर रही है।
सीएम से खुद संभाली कमान
शुरुआती दिनों में अभियान की रफ्तार सुस्त रही, खासकर शहरी इलाकों में। बीएलओ फॉर्म भरने में लापरवाह साबित हुए, जिससे विपक्ष ने इसे 'भाजपा का वोट कटौती प्लान' ठहरा दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद कमान संभाली। उन्होंने मंत्रियों, विधायकों और सांसदों को बूथ-स्तरीय कैंपों में उतरने का आदेश दिया। सोमवार को लखनऊ में आरएसएस, भाजपा संगठन और योगी सरकार की शीर्ष बैठक हुई, जहां मिशन 2027 पर मंथन किया गया।
'घुसपैठियों को साफ करने का मौका'
भाजपा इसे 'घुसपैठियों को साफ करने का मौका' बता रही है। एक ऐसा नैरेटिव जो हिंदुत्व की लाइन पर चलता है। राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने अखिलेश यादव पर निशाना साधा, एसआइआर से आरक्षण या नौकरी नहीं छिनती, बल्कि बिहार जैसा हाल सपा का होगा। अब भाजपा के पन्ना प्रमुख और युवा नेता सोशल मीडिया पर फॉर्म भरने की फोटो शेयर कर 'मिशन मोड' दिखा रहे हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि संगठन की शुरुआती निष्क्रियता से ही योगी को मैदान में उतरना पड़ा।
सपा का काउंटर-अटैक
समाजवादी पार्टी ने एसआईआर को 'असंवैधानिक साजिश' करार दिया। अखिलेश यादव ने कहा कि यह आरक्षण खत्म करने और महंगाई बढ़ाने का बहाना है। पार्टी ने सभी महासचिवों को जिलों का प्रभार सौंपा है, और एसआईआर प्रहरी अभियान चला रही है। अमरोहा से विधायक कमाल अख्तर ने मांग की, 16 करोड़ वोटर हैं, एसआईआर को कम से कम 16 चरणों में फैलाया जाए। सपा का फोकस मुस्लिम-अहीर वोटरों पर है, जो घर-घर जाकर नाम जुड़वा रहे हैं। सोशल मीडिया पर सपा कार्यकर्ता भाजपा पर 'विपक्षी वोटरों को टारगेट करने' का आरोप लगा रहे हैं।
माया ने ताज की पुरानी कटुता
बसपा सुप्रीमो मायावती ने पुरानी कटुता ताजा की, सपा पर 'दलित-ओबीसी के साथ पक्षपात' का आरोप लगाया। कांग्रेस और अन्य छोटे दल अभी चुप्पी साधे हैं, लेकिन बिहार चुनाव के बाद गठबंधन पर सवाल उठ रहे हैं। इमरान मसूद जैसे कांग्रेसी नेता अखिलेश को नसीहत दे रहे हैं। यूपी पर फोकस करो, गठबंधन की कमान पर जल्दबाजी मत करो।
महत्वाकांक्षाओं का आईना
यूपी की राजनीति में बयानबाजी कोई नई बात नहीं, लेकिन एसआईआर ने इसे चमकाने का नया बहाना दे दिया। नेता रोजाना टीवी, ट्विटर और रैलियों में उतर रहे हैं, जो उनकी 2027 वाली महत्वाकांक्षाओं को उजागर कर रहा है। आरएसएस की हालिया बैठक से संकेत मिले कि 2027 से पहले योगी को 'हिंदुत्व का नया चेहरा' बनाया जाएगा। उनकी सख्त छवि, साधु से मुख्यमंत्री जातिगत समीकरणों को तोड़ने का हथियार बनेगी। लेकिन विपक्ष इसे 'विभाजनकारी' बता रहा है। अखिलेश ने महिलाओं पर फोकस किया है, 'स्त्री सम्मान-समृद्धि योजना' के तहत डिंपल यादव, इकरा हसन और प्रिया सरोज को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। यह बिहार चुनाव के सबक से प्रेरित है, जहां महिला वोटरों ने खेल बदल दिया। लेकिन सपा-कांग्रेस गठबंधन पर खटास साफ दिख रही है। इमरान मसूद के बयान ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
2027 का सियासी रोडमैप
एसआईआर सिर्फ फॉर्म भरना नहीं, बल्कि वोट बैंक की जंग है। भाजपा इसे संगठन मजबूत करने का मौका मान रही, जहां आरएसएस का फोकस योगी को राष्ट्रीय चेहरा बनाने पर है। सपा इसे पीडीए को एकजुट करने का प्लेटफॉर्म बता रही है। शहरी इलाकों में सुस्ती, बीएलओ की लापरवाही और विपक्षी आरोप भी चुनौती बनकार उभरा है।