NCERT Book Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब में एक विवादित चैप्टर लिखने वाले तीन शिक्षाविदों की माफी को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने अपने पुराने आदेश का वह हिस्सा भी वापस ले लिया है, जिसमें तीनों शिक्षाविदों को किसी सरकारी संस्था में काम नहीं दिए जाने का निर्देश दिया गया था। जिन तीन शिक्षाविदों को राहत मिली है, उनके नाम माइकल डेनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना हैं।
प्रतिबंध हटा दिया
बता दें कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचौली की बेंच ने आदेश का वह हिस्सा हटा दिया है, जो इन शिक्षाविदों को सरकारी अनुदान वाली संस्थाओं में काम करने से रोक रहा था। तीनों शिक्षाविदों ने आवेदन दाखिल कर कहा था कि अध्याय लिखते समय उनकी कोई दुर्भावना नहीं थी और उस अध्याय के लिए वह अकेले जिम्मेदार नहीं थे।
कोर्ट की तरफ से अब कोई रोक नहीं
कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से कहा कि वे अब जरूरत के हिसाब से इन तीनों को काम देने पर विचार कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट की तरफ से अब कोई रोक नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि उसने अपनी तरफ से इन लोगों को स्कूली शिक्षा से संबंधित कोई भी काम न देने का फैसला किया है।
किसने क्या दलील दी?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार माइकल डेनिनो के वकील सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने दलील दी कि 11 मार्च का आदेश सुनाते वक्त याचिकाकर्ताओं का पक्ष नहीं सुना गया था। यह चैप्टर तैयार करना किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी टीम का सामूहिक फैसला था। सुपर्णा दीवाकर के वकील जे साई दीपक ने कहा कि इस मामले में उनके मुवक्किल की भूमिका सीमित थी, लेकिन कोर्ट के फैसले से उनकी आजीविका के आधार पर असर पड़ेगा। तीनों शिक्षाविदों ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि अध्याय लिखते समय उनका कोई गलत इरादा नहीं था और इसके लिए वे अकेले जिम्मेदार नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार करते हुए प्रतिबंध हटा दिया है।
'शिक्षाविदों की कोई दुर्भावना नहीं थी'
वहीं, आलोक प्रसन्ना के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि शिक्षाविदों की कोई दुर्भावना नहीं थी। जब न्यायपालिका को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर मीडिया में खुली चर्चा होती है तो उन्हें छात्रों से छिपाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि छात्रों को सिस्टम की कमियों और सच्चाई की जानकारी होनी चाहिए। एडवोकेट ने सवाल किया कि छात्रों के सामने हर संस्थान को पूरी तरह साफ-सुथरा दिखाना जरूरी है? स्कूलों और यूनिवर्सिटीज में इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणी
वकीलों की दलीलों पर जस्टिस जॉयमाला बागची ने कहा कि न्यायपालिका के बारे में जो भी जानकारी बच्चों को दी जाए, वह संतुलित होनी चाहिए। इस चैप्टर में भ्रष्टाचार को तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, जबकि कानूनी सेवाओं तक पहुंच के बारे में एक शब्द नहीं लिखा गया, लीगल सर्विसेज में जजों की भूमिका के बारे में कुछ नहीं बताया गया। एडवोकेट शंकरनारायणन ने कहा कि ऐसा नहीं है, इसमें न्यायपालिका के योगदानों पर भी चर्चा की गई थी।
क्या है पूरा मामला
आपको बता दें कि यह पूरा विवाद कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब से जुड़ा है। किताब के 'न्यायपालिका की भूमिका' चैप्टर में 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' नाम का एक हिस्सा जोड़ा गया था। इस चैप्टर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई थी और यह चैप्टर को हटाने और किताब की सभी कॉपियों पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया था। इसी के साथ कोर्ट ने कहा था कि उन्हें सरकारी अनुदान वाली किसी संस्था में काम नहीं दिया जाएगा। इस फैसले के खिलाफ ही तीनों शिक्षाविदों ने याचिका दाखिल कर अपना पक्ष रखा और माफी भी मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार करते हुए प्रतिबंध हटा दिया है।