राजस्थान के अंता में एक चाय की टपरी इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। ये कोई आम चाय की दुकान नहीं, बल्कि एक युवक की व्यथा और उसके विरोध की अनोखी मिसाल है। हथकड़ी पहनकर चाय बनाता ये युवक न केवल चाय पिलाता है, बल्कि अपने जीवन की कड़वी सच्चाई भी लोगों से साझा करता है। इस अनोखी दुकान का नाम है – '498ए टी कैफे', जो भारतीय दंड संहिता की उसी धारा की ओर इशारा करता है, जिसके तहत उसे पत्नी ने दहेज प्रताड़ना का झूठा केस लगाकर फंसा दिया। न्याय की लड़ाई में लगे केके धाकड़ का यह कदम सामाजिक विमर्श का मुद्दा बन गया है।
UPSC छोड़ टपरी तक की कहानी
मूलतः नीमच जिले के अठाना के रहने वाले कृष्णकुमार धाकड़ (केके) कभी UPSC की तैयारी कर रहे थे। शादी के बाद पत्नी के साथ मिलकर मधुमक्खी पालन का काम शुरू किया और महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी काम किया। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह सुखद जीवन एक झटके में बदल गया जब पत्नी ने 498ए और 125 के तहत केस दर्ज कर दिया।
चाय की टपरी बनी विरोध का मंच
अब केके धाकड़ अंता में ‘498ए टी कैफे’ नाम से चाय की दुकान चला रहे हैं। इस टपरी पर कई बैनर लगे हैं – "जब तक नहीं मिलेगा न्याय, तब तक उबलती रहेगी चाय", "आओ चाय पर करें चर्चा – 125 में कितना देना पड़ेगा खर्चा"। दुकान पर वरमाला, दूल्हे का सेहरा और हथकड़ी के साथ चाय परोसी जाती है, जो उनके जीवन की त्रासदी का प्रतीक बन चुका है।
मधुमक्खी पालन से मिली पहचान, फिर सब बर्बाद
2019 में पत्नी के साथ मिलकर शुरू किया गया मधुमक्खी पालन का काम इतना सफल हुआ कि राज्य स्तर तक सराहा गया। लेकिन 2022 में पत्नी के अचानक ससुराल छोड़ जाने के बाद कारोबार ठप हो गया। फिर पत्नी ने घरेलू हिंसा और खर्चे की मांग को लेकर मुकदमे दर्ज कराए, जिससे केके की पूरी जिंदगी बिखर गई।
न्याय के लिए संघर्ष, हथकड़ी के साथ चाय
केके का कहना है कि वह झूठे केस में मानसिक और सामाजिक रूप से टूट चुके हैं। अब वह आत्महत्या का नहीं, बल्कि विरोध का रास्ता चुनकर लोगों को अपनी आपबीती सुना रहे हैं। उनके मुताबिक कानून का दुरुपयोग कर पुरुषों को फंसाने की घटनाएं बढ़ रही हैं और यह चाय की टपरी इसी के खिलाफ उनकी आवाज है।
समाज को आईना दिखाती एक टपरी
498ए टी कैफे अब एक चाय की दुकान से कहीं अधिक बन चुका है। यह एक ऐसा मंच है जहां पुरुष उत्पीड़न, कानून के दुरुपयोग और सामाजिक बेइमानी जैसे मुद्दों पर लोग खुलकर बात कर रहे हैं। केके की ये लड़ाई सिर्फ उनके लिए नहीं, उन सभी पुरुषों के लिए भी है जो न्याय के लिए भटक रहे हैं।