जिस बेटी की दुनिया दो साल की उम्र में उजड़ गई थी, उसे किसी शिक्षक ने न सिर्फ सहारा दिया, बल्कि एक पिता की तरह संवार दिया। जब उसी बेटी की डोली उठी, तो पूरा गांव नम आंखों से उसे विदा कर रहा था। यह कहानी है इंसानियत, अपनत्व और समाज के लिए एक अनमोल सीख की। मध्यप्रदेश के बड़ख़रा (चुरहट) गांव की ललिता कोरी की ज़िंदगी एक दर्दनाक मोड़ पर तब आ गई जब वह केवल दो साल की थी। माता-पिता की मृत्यु के बाद उसके सिर से साया उठ गया। ऐसे हालात में जब समाज उसे प्रशासन के हवाले करना चाहता था, तब एक शिक्षक ने फरिश्ता बनकर उसका हाथ थाम लिया।
शिक्षक बना संरक्षक, निभाया पिता का हर फर्ज
गांव के शिक्षक पुष्पराज सिंह ने न केवल ललिता को, बल्कि उसके भाई और बहन को भी अपनी संतान की तरह अपना लिया। तीनों बच्चों को अपने घर में पाला, उन्हें शिक्षा दी, संस्कार दिए और जीवन की हर ज़रूरत को पूरा किया। उन्होंने यह सब बिना किसी स्वार्थ, जात-पात या भेदभाव के किया—सिर्फ इंसानियत के नाम पर।
डोली उठी तो भीगी आंखें और भारी दिल थे
जब ललिता विवाह योग्य हुई, तो पुष्पराज सिंह ने एक पिता की तरह उसकी शादी की जिम्मेदारी उठाई। सीधी जिले के पड़रा निवासी गोपाल कोरी से उसका विवाह हुआ और विदाई स्थल बना बड़ौरा का शिव मंदिर। गांव भर के लोग इस शादी में शामिल हुए और बेटी की डोली उठने पर हर आंख नम हो गई।
सिर्फ पालन नहीं, आत्मनिर्भरता भी सिखाई
पुष्पराज सिंह ने ललिता और उसकी बहनों को सिर्फ सुरक्षा ही नहीं दी, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया। सिलाई-कढ़ाई और हुनर सिखाकर उन्होंने बेटियों को खुद का भविष्य संवारने की ताकत भी दी। यह केवल परवरिश नहीं थी, यह था एक समर्पित सामाजिक दायित्व। शिक्षक ने न सिर्फ एक बच्ची की ज़िंदगी संवारी, बल्कि पूरे समाज को यह सिखाया कि जाति, धर्म या रिश्ते से बढ़कर अगर कुछ है तो वह है मानवता। उनकी ये कहानी अब एक गांव की नहीं, पूरे समाज की प्रेरणा बन गई है।