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Dead People on Mount Everest : माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी, जहां पहुंचना हर पर्वतारोही का सपना होता है। लेकिन ये सपना जितना रोमांचक है, उतना ही खतरनाक भी। एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान अब तक सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हैरान कर देने वाली बात यह है कि उनमें से कई लाशें आज भी वहीं पड़ी हुई हैं, बर्फ़ के नीचे जमी हुई, दशकों पुरानी लेकिन अब भी साफ़ दिखती हुई.
क्यों नहीं हटाई जातीं ये लाशें?
एवरेस्ट पर किसी भी शव को नीचे लाना बेहद मुश्किल और जानलेवा काम होता है। वहां का तापमान -40°C तक गिर जाता है, ऑक्सीजन की भारी कमी होती है, और मौसम कभी भी बिगड़ सकता है. एक डेड बॉडी का वजन औसतन 80-100 किलो होता है, और उस ऊंचाई पर उसे लाना एक और जान जोखिम में डालने जैसा है. इसीलिए, अधिकतर मामलों में मरे हुए पर्वतारोहियों की लाशों को वहीं छोड़ दिया जाता है — जहां उनकी मौत हुई थी.
कैसे बन गईं ये लाशें 'मार्कर पॉइंट'?
एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोही बताते हैं कि कई लाशें अब "मार्किंग पॉइंट्स" या "लैंडमार्क्स" की तरह उपयोग होती हैं. इनसे चढ़ाई करने वालों को यह पता चलता है कि वे रास्ते में कहां हैं. उदाहरण के तौर पर, एक बेहद प्रसिद्ध लाश है जिसे "ग्रीन बूट्स" (Green Boots) कहा जाता है। यह शव एक भारतीय पर्वतारोही का माना जाता है जो 1996 में मारा गया था. उसकी हरी रंग की बूट आज भी एक गुफा के पास साफ़ दिखाई देती हैं, और वो पॉइंट एवरेस्ट पर चढ़ने वालों के लिए एक आम रेफरेंस बन चुका है.
कितनी लाशें हैं माउंट एवरेस्ट पर?
अनुमान लगाया जाता है कि आज भी 200 से ज़्यादा लाशें माउंट एवरेस्ट पर पड़ी हुई हैं। कुछ आइस और बर्फ़ के नीचे पूरी तरह दब चुकी हैं, जबकि कुछ खुले में हैं और धीरे-धीरे ठंडी हवाओं और मौसम की मार से संरक्षित हो गई हैं.
क्या कोई कोशिश की गई उन्हें हटाने की?
कुछ मामलों में पर्वतारोहियों के परिवारों ने शवों को नीचे लाने की कोशिश की, लेकिन या तो वो मिशन अधूरा रह गया या फिर और भी ज़्यादा खतरनाक साबित हुआ। कभी-कभी शवों को बर्फ़ से ढक दिया जाता है या पास की चट्टानों से ढंक दिया जाता है, ताकि वो खुले में न रहें. लेकिन अधिकतर मामलों में यही माना जाता है कि "एवरेस्ट पर मरने वाले वहीं के हो जाते हैं. माउंट एवरेस्ट पर पड़ी ये लाशें केवल मूक गवाह नहीं हैं, बल्कि वो इस विशाल पर्वत की क्रूर सच्चाई भी बयान करती हैं. वे पर्वतारोहियों को चेतावनी देती हैं कि यह सफर केवल नाम और शौहरत का नहीं है, बल्कि जानलेवा जोखिम का भी है, और यह भी कि, पर्वत जीतने की कीमत कई बार किसी की ज़िंदगी होती है. एवरेस्ट की ऊंचाई तक पहुंचना जितना गर्व की बात है, उतना ही यह याद रखना ज़रूरी है कि वहां तक पहुंचने का रास्ता, कई बार मौत की देहलीज़ से होकर गुजरता है.