Akhanda 2 X Review : साउथ सिनेमा की भव्यता, ऊँची आवाज़ में डायलॉग और अवतार बदलते हीरो इन सबके बीच अखंडा 2 से दर्शकों की उम्मीदें आसमान छू रही थीं. पहले भाग की जबरदस्त लोकप्रियता ने सीक्वल के लिए ऐसा माहौल बना दिया था कि लोग सिनेमाघरों तक दौड़ पड़े। लेकिन रिलीज़ के बाद ही सोशल मीडिया पर एक अलग ही तस्वीर उभरने लगी. “कॉमन सेंस नाम की चीज होती है” जैसे तंज भरे कमेंट्स वायरल होने लगे और कई दर्शक फिल्म देखकर नाराज़ दिखे। सवाल यह नहीं कि फिल्म बड़ी है या छोटी, सवाल यह है कि क्या कहानी दर्शकों की बुद्धि से संवाद करती है? इसी बिंदु पर अखंडा 2 को लेकर विवाद खड़ा होता दिख रहा है.
नाराज़गी का पहला कारण
दर्शकों की नाराज़गी का पहला कारण फिल्म की कहानी और उसका ट्रीटमेंट बताया जा रहा है. कई लोगों के मुताबिक कथानक जरूरत से ज़्यादा खिंचा हुआ और अविश्वसनीय लगता है. एक्शन सीक्वेंस इतने अतिरंजित हैं कि वे रोमांच पैदा करने के बजाय हँसी का कारण बन जाते हैं. हीरो का हर सीन “मसीहा” अंदाज़ में दिखाना, बिना किसी तर्क या परिणाम के दुश्मनों को पल भर में खत्म कर देना, यह सब कुछ दर्शकों को थकाने लगता है. सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि मसाला फिल्मों में लॉजिक पूरी तरह खत्म नहीं होना चाहिए। जब हर सीन में गुरुत्वाकर्षण भी छुट्टी पर चला जाए, तो दर्शक खुद को कहानी से जोड़ नहीं पाता.
शिकायत डायलॉग्स और संदेश को लेकर
दूसरी बड़ी शिकायत डायलॉग्स और संदेश को लेकर है. अखंडा 2 धार्मिक प्रतीकों, राष्ट्रवाद और नैतिकता को बहुत ज़ोर से पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन कई दर्शकों को यह सब उपदेशात्मक और जबरन थोपा हुआ लगता है. “कॉमन सेंस नाम की चीज होती है” जैसी पंक्तियाँ इसी भावना से निकल रही हैं, जहाँ दर्शक महसूस करता है कि उसे सोचने का मौका नहीं दिया जा रहा, बस बताया जा रहा है कि क्या सही है और क्या गलत. कुछ लोग इसे भावनाओं का शोषण भी कह रहे हैं। उनका मानना है कि आस्था और एक्शन को संतुलन के साथ दिखाया जाना चाहिए, न कि सिर्फ तालियाँ बटोरने के लिए.
बैकग्राउंड म्यूज़िक....
हालाँकि यह कहना भी गलत होगा कि फिल्म में कुछ भी अच्छा नहीं है. तकनीकी स्तर पर अखंडा 2 भव्य दिखाई देती है. बैकग्राउंड म्यूज़िक दमदार है, सिनेमैटोग्राफी में बड़े फ्रेम्स और स्लो-मोशन शॉट्स फैंस को लुभाते हैं. लीड एक्टर का करिश्मा अब भी उनके प्रशंसकों के लिए आकर्षण का केंद्र है. लेकिन समस्या तब आती है जब स्टाइल, सब्सटेंस पर भारी पड़ने लगता है। दर्शकों का एक वर्ग मानता है कि अगर यही तकनीकी ताकत मजबूत स्क्रिप्ट और सीमित लेकिन प्रभावी एक्शन के साथ इस्तेमाल होती, तो अनुभव कहीं बेहतर हो सकता था.
कुल मिलाकर अखंडा 2 एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है, जो अपने फैंस को खुश करने में शायद सफल हो, लेकिन सामान्य दर्शक को विभाजित कर देती है. “आगबबूला” प्रतिक्रियाएँ इस बात का संकेत हैं कि आज का दर्शक सिर्फ शोर और भव्यता नहीं चाहता, उसे कहानी में तर्क, भावनात्मक गहराई और सम्मान भी चाहिए। मसाला सिनेमा की अपनी जगह है, पर उसमें भी कॉमन सेंस की उम्मीद की जाती है। अखंडा 2 पर हो रही बहस यही बताती है कि सिनेमा बदल रहा है और दर्शक भी अब वे सिर्फ सीटियाँ नहीं, संतुलन भी चाहते हैं.