
Nobel Prize In Medicine: साल 2025 का मेडिसिन नोबेल प्राइज अमेरिका के मैरी ई. ब्रंकॉ, अमेरिका के फ्रेड राम्सडेल और जापान के शिमोन साकागुची को मिला है। इन्हें यह प्राइज पेरीफेरल इम्यून टॉलरेंस के क्षेत्र में किए गए रिसर्च के लिए दिया गया है। इनकी यह खोज शरीर की रक्षा प्रणाली को समझने में क्रांति लाई है, जो आर्थराइटिस, टाइप-1 डायबिटीज और ल्यूपस के इलाज का रास्ता खोलेगी। इन तीनों को 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में 8.5 करोड़ रुपए, गोल्ड मेडल और सर्टिफिकेट इनाम के तौर पर दिया जाएगा।
ऑटोइम्यून बीमारी कहते हैं
आपको बता दें कि इसमें उन्होंने खोज की है कि शरीर के शक्तिशाली इम्यून सिस्टम को कैसे कंट्रोल किया जाता है, ताकि यह गलती से हमारे अपने अंगों पर हमला न करें। दरअसल हमारा शरीर इम्यून सिस्टम से हमेशा खतरे से लड़ता है, जैसे वायरस या बैक्टीरिया से, लेकिन कभी-कभी यह सिस्टम गलती से अपने ही अंगों पर हमला कर देता है, जिसे ऑटोइम्यून बीमारी कहते हैं।
2001 में खास जीन खोज निकाला
2001 में मैरी ब्रंकॉ और फ्रेड राम्सडेल ने एक खास जीन खोज निकाला। उन्होंने पाया कि "Foxp3" नाम का यह जीन खराब हो जाए तो इम्यून सिस्टम बिगड़ जाता है। FOXP3 में म्यूटेशन से IPEX सिंड्रोम होता है – एक दुर्लभ बीमारी जहां बच्चे का इम्यून सिस्टम अपने ही शरीर पर हमला करता है। तीनों ने मिलकर दिखाया कि सेंट्रल टॉलरेंस के अलावा पेरिफेरल टॉलरेंस भी जरूरी है।
11 मिलियन पुरस्कार राशि मिलेगी
बता दें कि ब्रंको, राम्सडेल और साकागुची ने इस प्रक्रिया को समझने में अहम योगदान दिया। उन्होंने इम्यून सिस्टम के ‘सुरक्षा गार्ड’ यानी रेगुलेटरी T-सेल्स की पहचान की, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि इम्यून सेल हमारे अपने शरीर पर हमला न करें। नोबेल समिति ने कहा कि यह खोज इम्यून सिस्टम को नियंत्रित रखने का तरीका बताती है। पुरस्कार राशि 11 मिलियन स्वीडिश क्रोना (करीब 8.5 करोड़ रुपये) है, जो तीनों में बांटे जाएंगे। यह पुरस्कार दिसंबर में स्टॉकहोम में समारोह मिलेगा।