Three Former Judges Questioned: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी विपक्ष के प्रदर्शन पर तीन पूर्व जजों ने सवाल उठाए हैं। दिल्ली हाई कोर्ट, उत्तराखंड हाई कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जजों ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने से पहले ठोस सबूत सामने रखे जाने चाहिए। वहीं, 42 पूर्व जजों और अधिकारियों ने भी खुले पत्र के जरिए चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों पर चिंता जताई है।
पूर्व जस्टिस एसएन ढींगरा ने आंदोलन के तरीके पर उठाए सवाल
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस एसएन ढींगरा ने विपक्ष के प्रदर्शन को लेकर कहा कि विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसके लिए कानून और व्यवस्था का पालन भी जरूरी है। उनके मुताबिक, विपक्ष को अपनी बात संसद या अदालत में रखनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कानून तोड़ने और दूसरे लोगों के साथ गलत व्यवहार करने की घटनाएं सामने आई हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने वाले नेताओं ने उनके खिलाफ कौन-से ठोस सबूत पेश किए हैं।
चुनाव आयोग पर आरोप लगाने के लिए सबूत जरूरी: जस्टिस लोकपाल सिंह
उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए जा रहे आरोपों के समर्थन में स्पष्ट प्रमाण सामने आने चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन बिना सबूत किसी अधिकारी को हटाने की मांग करना उचित नहीं है। उन्होंने चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होने के दावों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उनके सामने ऐसे आरोपों को साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण नहीं आया है। उन्होंने प्रदर्शन के कारण दिल्ली में लोगों की आवाजाही प्रभावित होने पर भी चिंता जताई।
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जस्टिस शेखर यादव ने SIR को लेकर विपक्ष पर साधा निशाना
इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस शेखर यादव ने कहा कि विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार और संस्थाओं से सवाल पूछना है, लेकिन विरोध के दौरान अव्यवस्था नहीं होनी चाहिए। उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पर उठाए जा रहे सवालों को लेकर विपक्ष की आलोचना की। उनके अनुसार, यदि विपक्ष को प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी दिखाई देती है तो उसे तथ्यों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग से पहले आरोपों के आधार स्पष्ट होने चाहिए।
42 पूर्व जजों और अधिकारियों ने भी जताई चिंता
इस बीच, 42 पूर्व जजों और पूर्व अधिकारियों की ओर से जारी खुले पत्र में संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ लगातार लगाए जा रहे आरोपों पर चिंता जताई गई है। पत्र में कहा गया है कि चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते समय तथ्यों और सबूतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इन पूर्व अधिकारियों का मानना है कि बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। हालांकि, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका को लेकर विपक्ष के सवालों पर भी तथ्यों के आधार पर चर्चा जरूरी है।