तृणमूल कांग्रेस में जारी सियासी खींचतान अब नए मोड़ पर पहुंच गई है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय की ओर से अचानक भेजे गए नोटिस और दूसरी तरफ बागी सांसदों के विलय के दावे ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया क्योंकि नोटिस ऐसे समय भेजा गया, जब अभिषेक बनर्जी प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में शामिल थे। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के अगले कदम पर टिकी हैं।
दो घंटे में पेश होने का मिला संदेश
सूत्रों के अनुसार, 15 जून को दोपहर करीब 2 बजे अभिषेक बनर्जी को ईमेल के जरिए शाम 4 बजे लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय में उपस्थित होने के लिए कहा गया। हालांकि उस समय वह प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में शामिल थे, जिसके कारण वह अपना मोबाइल फोन और निजी ईमेल नहीं देख सके।
कीर्ति आजाद ने संभाला मोर्चा
बताया गया है कि ईमेल भेजे जाने के कुछ समय बाद स्पीकर कार्यालय की ओर से सांसद कीर्ति आजाद से संपर्क किया गया। इसके बाद कीर्ति आजाद स्वयं स्पीकर कार्यालय पहुंचे और अधिकारियों को जानकारी दी कि अभिषेक बनर्जी जांच प्रक्रिया में व्यस्त हैं और निर्धारित समय पर बैठक में शामिल नहीं हो सकते। उन्होंने नई तारीख तय करने का अनुरोध भी किया।
बागी सांसदों ने की विलय को मान्यता देने की मांग
इस पूरे घटनाक्रम के बीच TMC के 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अपने समूह के दूसरे राजनीतिक दल में विलय को मान्यता देने की मांग की है। बागी सांसद अपने कदम को वैध ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि पार्टी नेतृत्व इस कार्रवाई का विरोध कर रहा है।
जल्दबाजी में फैसला नहीं करेंगे स्पीकर
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में किसी भी तरह का त्वरित निर्णय लेने के पक्ष में नहीं हैं। पहले दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी और संबंधित दस्तावेजों की समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा।
राजनीतिक और कानूनी दोनों नजरिए से अहम मामला
TMC के भीतर पैदा हुआ यह विवाद अब केवल राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रह गया है। बागी सांसदों के विलय का मुद्दा संसदीय प्रक्रिया और कानूनी व्याख्या से भी जुड़ गया है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय राजनीति की नजर बनी रहेगी।