देश की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। विपक्षी दलों के भीतर बढ़ती असहमति और गठबंधन राजनीति में आई दरारों के बीच सत्ताधारी बीजेपी संसद में अपने महत्वपूर्ण विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। खास तौर पर परिसीमन विधेयक को लेकर नए राजनीतिक समीकरण बनते नजर आ रहे हैं, जिससे आने वाले समय में संसद की तस्वीर बदल सकती है।
टीएमसी में बढ़ी अंदरूनी कलह
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी के कई विधायक नेतृत्व को लेकर अलग रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस आंतरिक खींचतान का असर पार्टी की संसदीय ताकत पर भी पड़ सकता है। यदि सांसदों के स्तर पर भी टूट की स्थिति बनती है तो राष्ट्रीय राजनीति में इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में आई तल्खी
दक्षिण भारत की राजनीति में भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ी दूरी ने विपक्षी एकजुटता को कमजोर किया है। डीएमके ने गठबंधन सहयोग को लेकर नाराजगी जताते हुए कई मंचों से अलग रुख अपनाया है। इस घटनाक्रम ने संसद के भीतर विपक्ष की रणनीतिक ताकत को प्रभावित किया है और सत्ता पक्ष के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
दो-तिहाई बहुमत पर बीजेपी की नजर
बीजेपी और एनडीए का फोकस अब संसद में विशेष बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने पर है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद उच्च सदन में एनडीए की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत मानी जा रही है। पार्टी विभिन्न क्षेत्रीय दलों और स्वतंत्र रुख रखने वाले सांसदों से मुद्दों के आधार पर समर्थन जुटाने की संभावनाएं तलाश रही है। इससे बड़े विधेयकों को पारित कराने की रणनीति को बल मिल सकता है।
परिसीमन विधेयक क्यों है अहम?
प्रस्तावित परिसीमन विधेयक देश के राजनीतिक भूगोल में बड़ा बदलाव ला सकता है। इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करने का प्रावधान है। चूंकि यह संविधान संशोधन से जुड़ा विषय है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। यही वजह है कि इसके लिए संख्या बल सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है।
बदलते समीकरणों से क्या होगा असर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच बढ़ती दूरी और संभावित टूट का सीधा लाभ सत्ता पक्ष को मिल सकता है। यदि संसद में कुछ दल तटस्थ रुख अपनाते हैं या मतदान से दूरी बनाते हैं, तो विशेष बहुमत का गणित बदल सकता है। ऐसे में आने वाले संसदीय सत्र देश की राजनीति और संवैधानिक बदलावों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं