देश में रोजाना करोड़ों लोग ट्रेन से सफर करते हैं और लंबी दूरी की ट्रेनों में टिकट की भारी मांग रहती है। अक्सर लोग बुज़ुर्ग माता-पिता के लिए एक साथ यात्रा की टिकट बुक करते हैं, लेकिन सिस्टम ऑटोमैटिक अलॉटमेंट के कारण सीटें अलग-अलग कोच में कंफर्म हो जाती हैं। यह स्थिति खासकर स्लीपर और एसी कोच में ज्यादा देखने को मिलती है। बुज़ुर्ग यात्रियों के लिए यह परेशानी बढ़ा देती है, क्योंकि एक-दूसरे से दूर बैठना असुविधाजनक और असुरक्षित भी लग सकता है। हालांकि ऐसी स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि रेलवे की व्यवस्था में समाधान के रास्ते मौजूद हैं।
चार्ट बनने के बाद बढ़ जाते हैं मौके
सबसे पहला और आसान तरीका है ट्रेन के चलने से पहले चार्ट बनने का इंतजार करना। चार्ट बनने के बाद सीट और कोच की स्थिति पूरी तरह साफ हो जाती है। कई बार ऐसा होता है कि चार्ट बनने के बाद भी उसी कोच या आसपास के कोच में कुछ सीटें खाली रह जाती हैं। ऐसी स्थिति में सीट बदलवाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसलिए चार्ट बनने से पहले घबराने के बजाय स्थिति को ध्यान से देखें और अगला कदम सोच-समझकर उठाएं।
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टीटीई से बात करने पर मिलती है मदद
यात्रा के दिन ट्रेन में चढ़ते ही टीटीई से संपर्क करना सबसे अहम कदम होता है। उन्हें शांति से पूरी स्थिति समझाएं और बताएं कि मामला बुज़ुर्ग यात्रियों का है। अधिकतर मामलों में टीटीई सहयोग करते हैं, खासकर जब सीट पास के कोच में उपलब्ध हो। अगर उसी कोच में सीट खाली नहीं होती, तो टीटीई दूसरे यात्रियों से सहमति लेकर सीट एक्सचेंज कराने की कोशिश करते हैं। कई यात्री बुज़ुर्गों की मदद के लिए अपनी सीट बदलने को तैयार हो जाते हैं, जिससे समस्या का समाधान निकल आता है।
पहले से करें तैयारी तो परेशानी बचे
अगर आप पहले से सावधानी बरतें तो ऐसी परेशानी से काफी हद तक बचा जा सकता है। टिकट बुक करते समय सीनियर सिटिजन कोटा और लोअर बर्थ का विकल्प जरूर चुनें। इससे एक ही कोच में सीट मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यात्रा से पहले रेलवे हेल्पलाइन 139 पर कॉल करके भी समस्या दर्ज कराई जा सकती है, जिससे टीटीई को पहले से जानकारी मिल जाती है। ऑनलाइन टिकट बुक करने वालों के लिए रेलवे ऐप या वेबसाइट पर शिकायत दर्ज करने का विकल्प भी मौजूद है। सही समय पर सही कदम उठाकर बुज़ुर्ग माता-पिता की यात्रा को आरामदायक और सुरक्षित बनाया जा सकता है।