UP News: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की बिसात पूरी तरह बिछने से पहले विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटें राजनीतिक दलों के लिए बड़ा परीक्षण बनने जा रही हैं। छह शिक्षक और पांच स्नातक सीटों के लिए होने वाला यह चुनाव दिसंबर 2026 में प्रस्तावित है। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले होने वाले इस मुकाबले को दल अपने संगठन, प्रभावशाली मतदाता वर्गों तक पहुंच और संभावित गठबंधन की दिशा परखने के अवसर के रूप में देख रहे हैं।
सपा ने सभी 11 सीटों पर खोले पत्ते
समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक दोनों वर्गों की सभी 11 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। शिक्षक सीटों पर वाराणसी-मिर्जापुर से लाल बिहारी यादव, गोरखपुर-फैजाबाद से कमलेश, मेरठ-गाजियाबाद से नितिन कुमार तोमर, आगरा-अलीगढ़ से डॉ. प्रकाश चंद्र गुप्ता, बरेली-मुरादाबाद से हाजी मोहम्मद दानिश अख्तर और लखनऊ से सुशील कुमार पटेल को मैदान में उतारा है। स्नातक सीटों पर इलाहाबाद-झांसी से डॉ. मान सिंह, वाराणसी-मिर्जापुर से आशुतोष सिन्हा, लखनऊ से कांति सिंह, मेरठ-सहारनपुर से प्रमेंद्र भाटी और आगरा से शशांक यादव को प्रत्याशी बनाया गया है।
भाजपा ने पांच पुराने चेहरों पर जताया भरोसा
भाजपा ने भी अपने पांच उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं और खास बात यह है कि पार्टी ने सभी पांच मौजूदा प्रत्याशियों को दोबारा मौका दिया है। लखनऊ स्नातक से अवनीश कुमार सिंह, आगरा स्नातक से मानवेंद्र प्रताप सिंह, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक से हरि सिंह ढिल्लों, लखनऊ शिक्षक से उमेश द्विवेदी और मेरठ शिक्षक से श्रीचंद शर्मा मैदान में होंगे।
कांग्रेस ने भी अलग राह चुनी
कांग्रेस ने पहले चरण में पांच नाम घोषित किए थे। इनमें लखनऊ स्नातक से डॉ. देवमणि तिवारी, मेरठ-सहारनपुर स्नातक से विक्रांत वशिष्ठ, आगरा स्नातक से रघुराज पाल, वाराणसी शिक्षक से संजय प्रियदर्शी और वाराणसी स्नातक से अरविंद सिंह पटेल शामिल हैं। पार्टी ने सभी 11 सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा की थी। बाकी छह सीटों के लिए नाम बाद में घोषित किए जाने थे।
छोटे चुनाव में बड़ा राजनीतिक संदेश
इन निर्वाचन क्षेत्रों में आम विधानसभा चुनाव जैसा मतदाता आधार नहीं है। शिक्षक और पंजीकृत स्नातक यहां निर्णायक होते हैं। इसलिए नतीजे दलों की सामान्य लोकप्रियता से ज्यादा शिक्षित वर्ग, कर्मचारी संगठनों और स्थानीय नेटवर्क में पकड़ का संकेत दे सकते हैं।
सपा के लिए चुनौती अपने आधार को इन संगठित मतदाता समूहों तक विस्तार देने की है। भाजपा अपने कब्जे वाली सीटों को बचाने के साथ बढ़त मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव अलग संगठनात्मक पहचान बनाने की परीक्षा है। खास बात यह भी है कि सपा और कांग्रेस ने अलग-अलग प्रत्याशी उतारकर 2027 के संभावित गठबंधन से पहले अपने-अपने राजनीतिक आधार की ताकत नापने का रास्ता खोल दिया है। ऐसे में परिषद चुनाव का परिणाम विधानसभा की तस्वीर तो तय नहीं करेगा, लेकिन अगले बड़े मुकाबले से पहले राजनीतिक दलों की जमीन जरूर नाप देगा।