स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच 2026 की शुरुआत हो चुकी है। यह सम्मेलन 19 जनवरी से 23 जनवरी तक चलेगा, जिसमें दुनिया के 130 से ज्यादा देशों के करीब 3 हजार प्रतिनिधि और 850 से अधिक शीर्ष सीईओ शामिल हो रहे हैं। इस बार दावोस की थीम संवाद की भावना रखी गई है, जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार चुनौतियों और निवेश के नए रास्तों पर चर्चा की जा रही है।
ट्रंप की मौजूदगी ने बढ़ाई हलचल
इस बार दावोस की सबसे बड़ी चर्चा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी को लेकर है। अपने संबोधन के बाद ट्रंप एक खास रिसेप्शन डिनर में शामिल होंगे। इस डिनर में दुनिया भर के चुनिंदा उद्योगपतियों को आमंत्रित किया गया है। खास बात यह है कि भारत से सात बड़े कॉरपोरेट चेहरों को इस डिनर का न्योता मिला है, जिससे भारत की वैश्विक आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा रहा है।
डिनर टेबल पर नजर आएंगे ये 7 भारतीय सीईओ
ट्रंप के साथ डिनर में शामिल होने वाले भारतीय सीईओ में टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन, महिंद्रा ग्रुप के ग्रुप सीईओ अनीश शाह, इंफोसिस के सीईओ सलील पारेख और विप्रो के सीईओ श्रीनी पल्लिया शामिल हैं। इसके अलावा भारती एंटरप्राइजेज के चेयरमैन सुनील मित्तल, बजाज फिनसर्व के चेयरमैन संजीव बजाज और जुबिलेंट भरतिया ग्रुप के फाउंडर हरि एस भरतिया भी इस खास डिनर का हिस्सा होंगे।
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भारत के लिए क्यों अहम है यह डिनर
इन सात भारतीय सीईओ की मौजूदगी यह दिखाती है कि भारत का कॉरपोरेट सेक्टर अब वैश्विक फैसलों में बड़ी भूमिका निभा रहा है। दावोस जैसे मंच पर सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति से संवाद का मौका मिलना निवेश, व्यापार और तकनीक के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। इससे भारत और अमेरिका के कारोबारी रिश्तों को नई दिशा मिल सकती है।
किन मुद्दों पर हो सकती है अहम बातचीत
डिनर के दौरान व्यापार नीतियों, निवेश के अवसरों, तकनीकी सहयोग और वैश्विक सप्लाई चेन पर चर्चा हो सकती है। माना जा रहा है कि टैरिफ से जुड़े मुद्दे खास तौर पर बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं। इसके अलावा एच वन बी वीजा नियम, आईटी सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े सवाल भी उठ सकते हैं।
भारत की बढ़ती ताकत का संकेत
दावोस में ट्रंप और भारतीय सीईओ की यह मुलाकात सिर्फ एक डिनर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भविष्य की आर्थिक साझेदारी का संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मंचों पर भारत की मजबूत मौजूदगी यह बताती है कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक रणनीतियों में भारत की भूमिका और मजबूत होने वाली है।