अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने दवाओं की कीमतों में बड़ी कटौती का ऐलान कर पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका में लोगों को अब महंगी दवाओं से राहत मिलेगी और दवाओं की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर से जोड़ी जाएंगी। उन्होंने इसे “फेवर्ड नेशन प्राइसिंग” बताया, यानी अमेरिका को वही कीमत मिलेगी जो दुनिया के सबसे सस्ते देशों में दी जाती है। ट्रंप का दावा है कि कुछ दवाओं की कीमतें 300 से 700 प्रतिशत तक घटाई जाएंगी, जो अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम के लिए बड़ा बदलाव होगा।
नौ दवा कंपनियों से हुई बड़ी डील
इस फैसले को लागू करने के लिए ट्रंप ने अमेरिका और यूरोप की नौ बड़ी दवा कंपनियों से समझौता किया है। इनमें Merck, Bristol Myers Squibb, Amgen, Gilead, GSK, Sanofi, Genentech, Boehringer Ingelheim और Novartis शामिल हैं। इन कंपनियों ने कीमतें घटाने और संभावित टैरिफ से बचने के लिए ट्रंप प्रशासन से हाथ मिलाया है।
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भारत के फार्मा सेक्टर पर असर
इस फैसले का असर भारत पर भी पड़ सकता है। भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का बड़ा सप्लायर है और अमेरिका भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार माना जाता है। खासकर डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी लंबी बीमारियों की दवाओं में भारत की मजबूत पकड़ है। अगर अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवाओं की कीमत तय करता है, तो भारतीय कंपनियों पर कीमत और मार्जिन का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, भारत में दवाओं की कीमतें पहले से ही कम हैं, इसलिए कुछ मामलों में भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त भी मिल सकती है।
टैरिफ और मैन्युफैक्चरिंग का नया खेल
ट्रंप ने साफ कहा है कि अमेरिका विदेशी सरकारों पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ का इस्तेमाल करेगा, ताकि दवाओं की कीमतें और कम हों। साथ ही उन्होंने दवा निर्माण को अमेरिका में बढ़ाने की बात भी कही है। इससे भारतीय कंपनियों को अमेरिका में निवेश और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, यह फैसला भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के लिए चुनौती और अवसर दोनों लेकर आया है। अब सबकी नजर इस पर है कि भारत का जेनेरिक दवा उद्योग इस नई वैश्विक रणनीति के साथ खुद को कैसे ढालता है।