रूसी तेल खरीद को लेकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी भारत के प्रति अधिक क्यों है, जबकि चीन पर वह उतने हमलावर नहीं दिखते? इस पर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक कूगलमैन का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने इसके पीछे की राजनीतिक मनोविज्ञान और कूटनीतिक समीकरणों को समझाने की कोशिश की है।
चीन ने ट्रंप को श्रेय लेने से नहीं रोका
कूगलमैन के अनुसार, जब अमेरिका ने वैश्विक सीजफायर या तनाव कम करने की कोशिशें कीं, तब चीन ने सार्वजनिक रूप से कभी ट्रंप को श्रेय लेने से मना नहीं किया। न ही चीन के किसी नेता ने ट्रंप के साथ लंबी बातचीत करके उन्हें यह जताया कि उनकी भूमिका सीमित रही। इसका ट्रंप के मनोबल पर सकारात्मक असर पड़ा।
भारत के साथ हुआ उल्टा
कूगलमैन ने बताया कि भारत के मामले में ट्रंप को कुछ अलग अनुभव हुआ। भारत ने अमेरिकी दखल या मध्यस्थता को लेकर खुलकर राय दी, साथ ही कई मौकों पर ट्रंप की बातें सार्वजनिक रूप से खारिज की गईं। ऐसे में यह संभव है कि ट्रंप को यह अपमानजनक लगा हो और वे अपनी नाराजगी भारत पर व्यापार और शुल्क के जरिए जाहिर कर रहे हों।
यह है डबल स्टैंडर्ड?
विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की 'डिप्लोमेसी ऑफ इगो' का हिस्सा हो सकता है, जहां निजी प्रतिक्रियाएं नीतिगत फैसलों पर हावी हो जाती हैं। भारत पर तीखे बयान और चीन पर संयम, इसी विरोधाभास को दर्शाता है।