अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाने का बड़ा फैसला लिया है। इसका कारण भारत द्वारा रूस से तेल खरीदना बताया जा रहा है। हालांकि, इस सख्त नीति के बीच ट्रंप ने भारतीय दवा उद्योग को छूट दी है। दरअसल, अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाएं भारतीय जेनेरिक दवाओं पर काफी हद तक निर्भर हैं। यदि भारतीय दवाओं की आपूर्ति रुक जाती, तो अमेरिकी हेल्थ सर्विस पर गहरा संकट आ सकता था। इसी वजह से दवाओं को टैरिफ से बाहर रखा गया है।
भारतीय दवाओं पर क्यों मिली छूट
भारत की जेनेरिक दवाएं अमेरिकी मेडिकेयर सिस्टम का अहम हिस्सा हैं। अमेरिका में कई दवाएं बेहद कम मुनाफे पर उपलब्ध होती हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ती बनाए रखने में मदद करती हैं। यदि इन पर टैरिफ लगाया जाता, तो कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता और मरीजों पर दवाओं की कीमत का बोझ बढ़ जाता। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन ने भारतीय दवा उद्योग को टैरिफ से बाहर रखा।
अमेरिका की भारत पर निर्भरता
भारतीय दवाओं का अमेरिका में आयात लगभग 6% हिस्सेदारी रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर टैरिफ लगाया जाता तो भारतीय निर्यातक अपने शिपमेंट्स को ऑस्ट्रेलिया और अन्य बाजारों में ट्रांसफर करना शुरू कर देते। इससे अमेरिकी मेडिकेयर सिस्टम की स्थिरता खतरे में पड़ सकती थी। इसलिए जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ हटाना अमेरिका की मजबूरी भी था।
टैरिफ लागू होने के संभावित परिणाम
अगर टैरिफ वापस नहीं लिया गया होता, तो भारतीय कंपनियों को अमेरिकी पोर्टफोलियो में कटौती करनी पड़ती। बढ़ी हुई लागत का बोझ मरीजों पर डालना या अमेरिका में बिक्री बंद करना उनके पास विकल्प हो सकता था। लगातार गिरती कीमतों और कम मार्जिन की वजह से अमेरिकी बाजार भारतीय कंपनियों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता था।
भविष्य की स्थिति
अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी स्थापित करना भारतीय कंपनियों के लिए महंगा और लंबा प्रोसेस है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि दवा कंपनियां अमेरिका में निवेश टीकी बजाय भारत, यूरोप और बाकी विश्व के बाजारों पर अधिक ध्यान देंगी। हालांकि, इससे मूल्य प्रतिस्पर्धा बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवा बाजार में उतार-चढ़ाव आने की संभावना बनी हुई है।