अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में ईरान को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया। मंगलवार को अपने संबोधन में ट्रंप ने तेहरान के सामने बातचीत और सैन्य कार्रवाई के बीच विकल्प रखते हुए कहा कि अगर ईरान अमेरिका के साथ समझौते पर नहीं पहुंचता है तो उसे “नष्ट” किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समझौते के जरिए ईरान को दोबारा खड़े होने और आर्थिक रूप से समृद्ध बनने का मौका मिल सकता है, जबकि दूसरा रास्ता उसके लिए बेहद विनाशकारी होगा।
ट्रंप ने संकेत दिया कि उन्हें उम्मीद है कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान समझौते के लिए तैयार हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि तेहरान अमेरिका में होने वाले चुनावों के नतीजों पर नजर रख रहा है। हालांकि ट्रंप खुद इस चुनाव में उम्मीदवार नहीं हैं, लेकिन उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने की बात कही।
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की अपील
अमेरिकी राष्ट्रपति ने दूसरे देशों से ईरान का “पूर्ण आर्थिक अलगाव” करने का आह्वान किया। ट्रंप के मुताबिक, यह दबाव तब तक जारी रहना चाहिए जब तक ईरान वाणिज्यिक जहाजों पर हमले बंद नहीं करता, परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश छोड़ता और आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता। उन्होंने ईरान पर पहले हुए युद्धविराम का उल्लंघन करने का भी आरोप लगाया।
ट्रंप ने अपने संबोधन में ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि इस सैन्य अभियान में ईरान की नौसेना, वायुसेना, रडार नेटवर्क और मिसाइल तथा ड्रोन उत्पादन क्षमता को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। व्हाइट हाउस भी इस अभियान को ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करने की कार्रवाई के रूप में पेश करता रहा है।
होर्मुज पर भी ट्रंप का जोर
ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य का उल्लेख करते हुए कहा कि संघर्ष के दौरान अमेरिकी नौसेना ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से तेल की बड़ी मात्रा में आवाजाही सुनिश्चित की है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
उन्होंने उन दावों को भी खारिज किया कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के कारण अमेरिका के हथियारों के भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका के पास पर्याप्त गोला-बारूद मौजूद है और उसके सैन्य भंडार को तेजी से दोबारा भरा जा रहा है। ट्रंप के इस बयान से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बीच कूटनीतिक समझौते की संभावना और सैन्य दबाव, दोनों एक साथ चर्चा में आ गए हैं।