अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इंपोर्टेड जेनेरिक दवाओं पर नया टैरिफ प्लान घोषित किया है। इस योजना के तहत 1 अगस्त से अगले दो साल तक कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद एक साल तक 100% टैरिफ लागू होगा और फिर इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा। इस फैसले का उद्देश्य दवा कंपनियों को अमेरिका में ही उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना बताया गया है।
भारतीय कंपनियों को फिलहाल राहत
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा निर्यातकों में शामिल है और अमेरिका उसका सबसे बड़ा बाजार है। सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, सिप्ला, ल्यूपिन, अरबिंदो फार्मा और जाइडस लाइफसाइंसेज जैसी भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार में मजबूत मौजूदगी है। दो साल की राहत मिलने से इन कंपनियों को अपनी रणनीति और निवेश योजनाओं की समीक्षा करने का समय मिलेगा।
आगे बढ़ सकती हैं मुश्किलें
हालांकि फिलहाल निर्यात पर तत्काल असर सीमित रहने की उम्मीद है, लेकिन भविष्य में 100% और फिर 200% टैरिफ लागू होने पर भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिका को दवाएं भेजना महंगा हो सकता है। इससे कंपनियों को अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने या स्थानीय साझेदारों के साथ उत्पादन बढ़ाने पर विचार करना पड़ सकता है।
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अमेरिका के लिए भी अहम हैं जेनेरिक दवाएं
अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के अनुसार, अमेरिका में लिखी जाने वाली 90% से ज्यादा प्रिस्क्रिप्शन दवाएं जेनेरिक होती हैं। इसलिए जेनेरिक दवाएं अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। भारत लंबे समय से कम कीमत पर इन दवाओं की आपूर्ति करता रहा है।
बदल सकती है कंपनियों की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लंबे समय तक ऊंचे टैरिफ लागू रहते हैं, तो कई कंपनियां अमेरिका में उत्पादन क्षमता बढ़ाने या स्थानीय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग का सहारा ले सकती हैं। इससे उनकी कारोबारी रणनीति और निवेश की दिशा में बदलाव देखने को मिल सकता है।
राहत भी, चुनौती भी
ट्रंप के नए टैरिफ प्लान से भारतीय दवा कंपनियों को फिलहाल दो साल की राहत जरूर मिली है, लेकिन इसके बाद प्रस्तावित भारी टैरिफ उनके कारोबार पर असर डाल सकते हैं। ऐसे में आने वाले समय में कंपनियों की रणनीति और अमेरिका की अंतिम व्यापार नीति पर सभी की नजर रहेगी।