सोनाक्षी सिन्हा और जहीर इकबाल की फिल्म ‘तू है मेरी किरण’ एक अलग तरह की कहानी लेकर आई। फिल्म में एक पुराना फ्लिप फोन साल 2016 और 2026 को जोड़ता है। दो अलग-अलग समय में रहने वाले किरदारों के बीच होने वाला संपर्क कहानी को खास बनाता है। शुरुआत में यह विचार काफी दिलचस्प लगता है, लेकिन आगे चलकर फिल्म अपनी पकड़ खोने लगती है। अच्छे आइडिया के बावजूद कहानी दर्शकों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पाती।
टाइम-ट्रैवल की कहानी में कमजोर पड़ा लॉजिक
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी कहानी का लॉजिक है। किरण और समर के बीच पुराने फोन से संपर्क होता है, लेकिन समय में बदलाव का असर कैसे पड़ता है, इसे ठीक से समझाया नहीं गया। ऐसी कहानी में कुछ नियम साफ होने चाहिए, ताकि दर्शक उससे जुड़ सकें। शुरुआत का रहस्य दिलचस्पी बनाए रखता है, लेकिन बाद में कई बातें अधूरी और उलझी हुई लगने लगती हैं।
दूसरे हाफ में जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट
फिल्म का पहला हिस्सा सस्पेंस बनाए रखता है। दर्शक जानना चाहते हैं कि दोनों समय के बीच का रिश्ता आखिर क्या है। लेकिन इंटरवल के बाद कहानी में इतने मोड़ आते हैं कि कई जगह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा किरदार क्या कर रहा है। सस्पेंस बढ़ाने की कोशिश में कहानी की रफ्तार और साफ समझ, दोनों प्रभावित होती हैं।
प्यार से जुनून तक का बदलाव नहीं आया समझ
समर का किरण के लिए प्यार धीरे-धीरे जुनून में बदलता है। फिल्म में उसे एक प्रेमी, सट्टेबाजी से जुड़ा इंसान और पीछा करने वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। लेकिन उसके व्यवहार में यह बदलाव मजबूत तरीके से सामने नहीं आता। इसी वजह से किरदार की भावनाओं को समझना मुश्किल हो जाता है और कहानी का असर भी कम पड़ता है।
कमजोर क्लाइमैक्स और केमिस्ट्री ने बिगाड़ा मजा
फिल्म का अंत कई सवालों के जवाब साफ तरीके से नहीं दे पाता। फोन का रहस्य और कहानी के कुछ अहम हिस्से संतोषजनक तरीके से सामने नहीं आते। वहीं, सोनाक्षी सिन्हा ने अपने किरदार को निभाने की कोशिश अच्छी की है, लेकिन दोनों कलाकारों के बीच का भावनात्मक जुड़ाव कहानी की जरूरत के मुताबिक मजबूत नहीं बन पाता। सहायक कलाकारों को भी ज्यादा मौके नहीं मिले। कुल मिलाकर, बेहतर लेखन और साफ कहानी के साथ यह फिल्म ज्यादा असरदार बन सकती थी।