ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब खाड़ी देशों पर भी साफ दिखने लगा है। संयुक्त अरब अमीरात ने इस पूरे संकट के लिए सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। यूएई ने साफ कहा है कि अगर युद्ध के कारण डॉलर की कमी होती है, तो वह तेल और गैस के कारोबार के लिए चीनी युआन या अन्य करेंसी का इस्तेमाल शुरू कर सकता है। यह बयान वैश्विक आर्थिक संतुलन को लेकर बड़ा संकेत माना जा रहा है।
डॉलर के दबदबे पर बड़ा सवाल
दशकों से वैश्विक तेल व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता आया है, लेकिन यूएई के इस संकेत ने नई बहस छेड़ दी है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल व्यापार में युआन का इस्तेमाल बढ़ता है, तो यह डॉलर की पकड़ को कमजोर कर सकता है। मैक्रोइकोनॉमिक विश्लेषक ल्यूक ग्रोमेन के अनुसार यूएई ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए डॉलर स्वैप लाइन की मांग भी की है। अगर यह मांग पूरी नहीं होती, तो वैकल्पिक करेंसी की ओर झुकाव तेज हो सकता है।
गैर-डॉलर कारोबार के असर
अगर वैश्विक स्तर पर देश डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में व्यापार शुरू करते हैं, तो इसका असर पूरी आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के साथ डॉलर की स्थिति भी कमजोर हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गैर-डॉलर व्यापार अपनाने से देश अपने डॉलर भंडार को बचाकर पुराने कर्ज चुकाने में इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि नए सौदे अन्य मुद्राओं में किए जा सकते हैं। इससे वैश्विक व्यापार का संतुलन बदल सकता है।
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भारत में भी दिख रहा बदलाव
इस बदलते ट्रेंड का असर भारत में भी दिखाई देने लगा है। हाल ही में कुछ भारतीय कंपनियों ने ईरान से तेल खरीदते समय डॉलर के बजाय युआन में भुगतान किया है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और रिटेल सेक्टर की कंपनियां भी वैकल्पिक करेंसी में लेनदेन पर विचार कर रही हैं। रुपये की कमजोरी से बचने के लिए यह एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
आने वाले समय का संकेत
यूएई का यह बयान सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक बदलाव का संकेत भी है। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं होता और डॉलर की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कई देश नई मुद्राओं की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में आने वाले समय में तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जिसका असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।