यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नया नियम लागू किया है। इसका नाम है Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026। सरकार और यूजीसी का कहना है कि इससे कॉलेज और विश्वविद्यालयों में समानता का माहौल बनेगा। लेकिन नियम लागू होते ही इसका विरोध शुरू हो गया। कई छात्रों शिक्षकों और सामाजिक संगठनों को लगने लगा कि यह नियम समानता से ज्यादा डर और पक्षपात को बढ़ावा दे सकता है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रहा।
बरेली मजिस्ट्रेट के इस्तीफे से उठा सवाल
इस विवाद को सबसे ज्यादा हवा तब मिली जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने यूजीसी के नए नियम की तुलना अंग्रेजों के काले कानून रॉलेट एक्ट से कर दी। उनका कहना था कि यह नियम सामान्य वर्ग को शक की नजर से देखने जैसा है। एक प्रशासनिक अधिकारी का इस तरह खुलकर विरोध करना सरकार के लिए बड़ा झटका माना गया। इसके बाद यह मुद्दा सियासी और सामाजिक बहस का केंद्र बन गया।
क्या था रॉलेट एक्ट
रॉलेट एक्ट साल 1919 में ब्रिटिश सरकार लेकर आई थी। इसका मकसद भारत में आजादी की मांग कर रहे आंदोलनों को दबाना था। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को सिर्फ शक के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता था। न तो वारंट जरूरी था और न ही मुकदमा। बिना जूरी के सजा दी जा सकती थी और अपील का भी कोई अधिकार नहीं था। इस कानून ने अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता को पूरी तरह कुचल दिया था।
रॉलेट एक्ट के खतरनाक प्रावधान
रॉलेट एक्ट ने सरकार को असीमित ताकत दे दी थी। किसी को भी राजद्रोह के शक में जेल भेजा जा सकता था। मुकदमे गुप्त तरीके से चलते थे और आरोपी को वकील तक रखने की इजाजत नहीं होती थी। यही वजह थी कि पूरे देश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ। इसी कानून के विरोध में महात्मा गांधी ने आंदोलन छेड़ा था। आज भी रॉलेट एक्ट को दमन और अन्याय का प्रतीक माना जाता है।
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UGC नियम से क्यों की जा रही तुलना
अब यूजीसी के नए इक्विटी नियम की तुलना रॉलेट एक्ट से इसलिए हो रही है क्योंकि इसमें भी शिकायत की प्रक्रिया को एकतरफा बताया जा रहा है। नियम के तहत कोई भी व्यक्ति इक्विटी कमेटी में लिखित शिकायत कर सकता है। शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखी जाएगी और समिति सीधे कार्रवाई की सिफारिश कर सकती है। नियम में यह साफ नहीं है कि शिकायत के साथ सबूत देना जरूरी होगा या नहीं।
झूठे आरोप और प्रतिनिधित्व पर सवाल
छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि नियम में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ कोई सजा तय नहीं है। इससे गलत आरोप लगने का डर बढ़ जाता है। इसके अलावा इक्विटी सेंटर इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसी वजह से इसे एकतरफा नियम कहा जा रहा है। अब सवाल यही है कि क्या सरकार इन आशंकाओं को दूर करेगी या यह विवाद और गहराएगा।