ओलंपिक पदक विजेता मुक्केबाज विजेंद्र सिंह ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि शिक्षा का मकसद बराबरी का मौका देना होना चाहिए, न कि समाज को जातियों में बांटना। विजेंद्र का कहना है कि पढ़ाई का रास्ता जोड़ने वाला होता है, तोड़ने वाला नहीं। उनके इस बयान के बाद शिक्षा जगत और युवाओं के बीच यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया है।
छात्रों को वर्गों में बांटना बताया खतरनाक फैसला
विजेंद्र सिंह ने अपनी पोस्ट में साफ शब्दों में लिखा कि छात्रों को अलग-अलग वर्गों में बांटने वाला यह फैसला देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जो युवा आज कक्षा में बैठा है, वही कल देश को आगे ले जाएगा। ऐसे में उसे जातिगत पहचान के आधार पर अलग करना चिंता की बात है। विजेंद्र ने अपील की कि शिक्षा का उद्देश्य सबको आगे बढ़ने का समान मौका देना होना चाहिए, न कि नई दीवारें खड़ी करना।
यूजीसी से नियम वापस लेने की मांग
विजेंद्र सिंह ने यूजीसी से इस फैसले पर दोबारा सोचने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अगर शिक्षा में ही वर्गीकरण हावी हो गया तो इसका असर समाज पर भी पड़ेगा। उनका मानना है कि नियमों की मंशा भले ही भेदभाव खत्म करने की हो, लेकिन इसका तरीका गलत है। उन्होंने आग्रह किया कि यूजीसी इस फैसले को वापस ले और सभी छात्रों के लिए एक जैसा माहौल बनाए।
नए नियम क्या कहते हैं, क्यों मचा बवाल
यूजीसी के ये नए नियम 13 जनवरी 2026 को लागू किए गए हैं, जो 2012 के पुराने नियमों की जगह लेंगे। इन नियमों में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए इक्विटी कमेटी, इक्विटी स्क्वॉड, हेल्पलाइन और निगरानी व्यवस्था बनाने का प्रावधान है। मकसद यह बताया गया है कि किसी भी छात्र के साथ भेदभाव न हो और शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।
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परिभाषा को लेकर उठ रहे गंभीर सवाल
इन नियमों में जातिगत भेदभाव को एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। इसी बात को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कई लोगों का कहना है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। आलोचकों का मानना है कि यह नियम भेदभाव खत्म करने के बजाय समाज में नई खाई बना सकता है।
लगातार बढ़ता विरोध और आगे की राह
विजेंद्र सिंह का बयान सामने आने के बाद इस मुद्दे पर विरोध और तेज हो गया है। छात्र, शिक्षक और सामाजिक संगठन लगातार अपनी राय रख रहे हैं। कुछ लोग नियमों के समर्थन में हैं, तो कई इसे देश को बांटने वाला कदम बता रहे हैं। अब सबकी नजर यूजीसी पर है कि वह इस बढ़ते विरोध के बीच क्या फैसला लेती है और क्या इन नियमों में कोई बदलाव किया जाएगा।