उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों यूजीसी के नए नियमों को लेकर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे ने सियासी माहौल को गरमा दिया है। पहले ब्राह्मण समाज की नाराजगी की चर्चा थी, अब राजपूत समाज से जुड़े कुछ संगठनों ने भी खुलकर विरोध शुरू कर दिया है। इससे सत्ताधारी पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी होती दिख रही है।
करणी सेना का विरोध और बयान
करणी सेना के प्रमुख राज सिंह शेखावत ने यूजीसी के नए नियमों को सामान्य वर्ग और खासकर क्षत्रिय युवाओं के खिलाफ बताया है। उन्होंने 18 फरवरी 2026 को आंदोलन करने का ऐलान किया। साथ ही मायावती और बसपा को समर्थन देने की बात कहकर राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी। उनका कहना है कि सवर्ण समाज की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इस बयान के बाद विपक्ष को भी मुद्दा मिल गया है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
अगर पिछले चुनावों के आंकड़ों को देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में राजपूत मतदाताओं ने बीजेपी का समर्थन किया था। 2024 में भी यह समर्थन मजबूत ही रहा। यानी नाराजगी की चर्चा के बावजूद वोट प्रतिशत में बड़ी गिरावट नहीं दिखी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इस समाज का बड़ा चेहरा माना जाता है, जिससे समर्थन बना रहा है।
संघ प्रमुख का संतुलित रुख
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस पूरे विवाद पर कहा कि संघ बीजेपी को नहीं चलाता और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई कानून गलत है तो उसे संवैधानिक तरीके से बदला जा सकता है। उनके इस बयान को संतुलन साधने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि समाज के कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा अब भी जारी है।
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क्या बदलेगा चुनावी गणित?
राजपूत समाज का कुछ संगठनों के जरिए विरोध जताना जरूर चर्चा में है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ एक वर्ग पर आधारित नहीं है। बीजेपी ने अलग-अलग वर्गों के समर्थन से अपना आधार मजबूत किया है। ऐसे में केवल एक संगठन के विरोध से बड़ा बदलाव होना आसान नहीं माना जा रहा। फिर भी विपक्ष इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल यूजीसी का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। ब्राह्मण नाराजगी, राजपूत संगठनों का ऐलान और संघ प्रमुख का बयान—इन सबने माहौल को गर्म कर दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद जमीनी स्तर पर कितना असर डालता है। 2027 से पहले यह मुद्दा कितना बड़ा रूप लेता है, यह राजनीति की दिशा तय कर सकता है।