मध्य प्रदेश के उज्जैन में इस बार होली का रंग कुछ अलग ही नजर आया। महाकाल की नगरी में भक्तों ने शिव-गणों का रूप धारण कर श्मशान की राख, अबीर-गुलाल और फूलों से होली खेली। भजन, ढोल-नगाड़ों और नृत्य के बीच पूरा माहौल शिवमय हो गया। यहां की अनूठी परंपरा ने एक बार फिर आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।
महाकाल की छत्रछाया में शिवमय हुआ शहर
धर्म नगरी उज्जैन में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति और आध्यात्म का उत्सव बन जाती है। महाकालेश्वर मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव स्वयं भक्तों के बीच विराजते हैं। इसी विश्वास के चलते श्रद्धालु शिव-पार्वती, भूत-पिशाच और नंदी का रूप धारण कर उत्सव में शामिल हुए। पूरा शहर “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा।
शयन आरती भक्ति मंडल का विशेष आयोजन
होली से एक दिन पहले शयन आरती भक्ति मंडल द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंच पर प्रतीकात्मक रूप से शिव और पार्वती विराजमान हुए, मानो साक्षात भोलेनाथ अपने परिवार के साथ पधार गए हों। जैसे ही शिव-पार्वती नृत्य में लीन हुए, भक्त भी झूमने लगे। ढोल-नगाड़ों की थाप और भजनों की गूंज ने माहौल को और भी दिव्य बना दिया।
श्मशान की राख, चौसर और भांग की परंपरा
इस अनूठी होली की सबसे खास बात रही श्मशान की राख और फूलों से रंग खेलना। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाया, तो कहीं चौसर की बिसात बिछी नजर आई। दूसरी ओर पारंपरिक तरीके से भांग भी घोटी गई। महिला श्रद्धालुओं ने शिव-पार्वती के साथ बैठकर भजन गाए और उत्सव में सहभागिता निभाई।
आस्था और उल्लास का अद्भुत संगम
उज्जैन की यह होली केवल रंगों तक सीमित नहीं, बल्कि आस्था की गहराई को दर्शाती है। भक्तों का मानना है कि इस दिन शिव स्वयं अपनी अर्धांगिनी के साथ भक्तों के बीच आते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। यही कारण है कि यहां की होली पूरे देश में अलग पहचान रखती है। महाकाल नगरी का यह उत्सव हर वर्ष श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।