
संयुक्त राष्ट्र (UN) इस साल अपने 80 साल पूरे कर रहा है। यह ऐसा मंच है जहां दुनिया के हर देश को अपनी बात रखने का अधिकार मिलता है। भारत ने भी इसी मंच से आतंकवाद के मुद्दे को बार-बार उठाया है। यूक्रेन-रूस युद्ध हो या इजरायल-फिलिस्तीन का संघर्ष, हर बड़े वैश्विक मुद्दे पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र ही सबसे भरोसेमंद मंच माना जाता है।
अमेरिका ने कई संस्थाओं से बनाई दूरी
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं से खुद को अलग कर लिया है। अमेरिका ने पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और मानवाधिकार परिषद से दूरी बनाई, और अब 2025 के अंत तक UNESCO से भी हटने की तैयारी में है। इसके अलावा UN के मुख्य फंड में भी अमेरिका कटौती कर सकता है। इससे संस्थाओं की फंडिंग और योजनाओं पर असर पड़ रहा है।
कैसे होता है संयुक्त राष्ट्र को फंडिंग
संयुक्त राष्ट्र की फंडिंग दो हिस्सों में होती है। पहला होता है "रेगुलर बजट", जिससे संगठन के सामान्य कामकाज चलाए जाते हैं। दूसरा हिस्सा "पीसकीपिंग बजट" होता है, जिसका इस्तेमाल शांति बनाए रखने के लिए किए जाने वाले मिशनों पर होता है। हर सदस्य देश को अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से फंड देना होता है।
सबसे ज्यादा फंड कौन देता है?
2025 के लिए अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के रेगुलर बजट में 22% यानी करीब 82 करोड़ डॉलर का योगदान किया है। चीन का हिस्सा करीब 20% है। जापान 6%, जर्मनी 5.6%, ब्रिटेन 3.9% और फ्रांस 3.8% योगदान देते हैं। टॉप 10 में इटली, कनाडा, साउथ कोरिया और रूस भी शामिल हैं। भारत इस सूची में 34वें स्थान पर है और 3 करोड़ 76 लाख डॉलर का योगदान देता है।
देरी से फंड देने पर क्या होता है?
अगर कोई देश समय पर फंड नहीं देता, तो उसका बकाया ‘एरियर’ में जोड़ा जाता है। अगर दो साल से ज्यादा की रकम बकाया हो जाती है, तो उस देश का UN जनरल असेंबली में वोटिंग का अधिकार छीना जा सकता है। इस समय अफगानिस्तान, वेनेजुएला, बोलिविया जैसे देशों की फंडिंग बकाया है। हालांकि, छोटे और गरीब देशों जैसे साओ टोम और प्रिंसिप को राहत दी गई है।