आजकल हेल्थ इंश्योरेंस के विज्ञापनों में ‘अनलिमिटेड कवर’ शब्द खूब दिखाई देता है। इसे देखकर कई लोगों को लगता है कि अब अस्पताल का कितना भी बड़ा बिल आए, सब बीमा कंपनी ही चुकाएगी। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह शब्द कई बार आकर्षक मार्केटिंग का हिस्सा होता है और इसके पीछे कई नियम छिपे होते हैं।
असल में कैसे काम करता है?
‘अनलिमिटेड कवर’ का सीधा अर्थ यह नहीं होता कि हर खर्च बिना सीमा के कवर होगा। आमतौर पर इसका मतलब यह होता है कि आपकी बीमा राशि जरूरत पड़ने पर दोबारा रिफिल हो सकती है। जैसे 10 लाख का कवर खर्च होने के बाद कंपनी उसे फिर से सक्रिय कर सकती है। लेकिन हर खर्च का भुगतान बिना शर्त नहीं किया जाता।
कमरे की सीमा पड़ सकती है भारी
कई पॉलिसियों में कमरे के किराए की सीमा तय होती है। यदि पॉलिसी में सामान्य कमरे की अनुमति है और मरीज महंगा कमरा चुनता है तो सिर्फ कमरे का अंतर ही नहीं, डॉक्टर फीस और अन्य खर्चों में भी कटौती हो सकती है। इससे अस्पताल का बड़ा हिस्सा आपको खुद भरना पड़ सकता है।
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को-पेमेंट और सब लिमिट का खेल
कुछ पॉलिसियों में को-पेमेंट की शर्त होती है। इसका मतलब इलाज के खर्च का एक हिस्सा मरीज को अपनी जेब से देना होता है। इसके अलावा मोतियाबिंद, घुटना बदलने या पथरी जैसी बीमारियों पर अलग सीमा भी तय हो सकती है। यानी कुल कवर बड़ा होने के बावजूद कुछ इलाजों पर भुगतान सीमित रहता है।
डिडेक्टिबल भी समझना जरूरी
कई योजनाओं में डिडेक्टिबल की शर्त होती है। इसमें शुरुआती इलाज का खर्च आपको खुद उठाना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर अगर डिडेक्टिबल 50 हजार रुपये है, तो पहले यह राशि मरीज को भरनी होगी। इसके बाद ही बीमा कंपनी भुगतान शुरू करेगी।
पॉलिसी लेने से पहले पूछें सवाल
अनलिमिटेड कवर गलत नहीं है और कई मामलों में यह बेहद उपयोगी भी हो सकता है। लेकिन पॉलिसी लेने से पहले रूम रेंट, को-पेमेंट, सब लिमिट और शर्तों को ध्यान से समझना जरूरी है। सिर्फ बड़े दावों पर भरोसा करने के बजाय नियम पढ़ना ज्यादा समझदारी साबित हो सकता है।