उत्तर प्रदेश में भाजपा अगले प्रदेश अध्यक्ष के नाम का इंतज़ार कर रही है, जिसमें प्रमुख चर्चा ब्राह्मण, ओबीसी और दलित नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर है. सूत्रों के अनुसार भाजपा इस बार PDA (पिछड़ा‑दलित‑अल्पसंख्यक) के उलट एक हिन्दू मजबूत समीकरण बनाना चाहती है, इसलिए ब्राह्मण चेहरे के साथ-साथ युवा और ग्रामीण क्षेत्र से ओबीसी‑दलित चेहरों पर भी विचार हो रहा है, ताकि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का सोशल बैकग्राउंड मजबूत हो सके.
नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन क्यों महत्वपूर्ण?
भाजपा 2023 से खाली पड़े उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए लंबे समय से मंथन कर रही है. यह निर्णय 2027 विधानसभा चुनाव और स्थानीय चुनावों की रणनीति को तय करेगा. पार्टी अब जातीय समीकरण और संगठनात्मक मजबूती को देखते हुए सही चेहरा खोजने में लगी है.
ब्राह्मण या OBC कौन होगा फाइनल?
पार्टी के अंदर चर्चा है कि अंतिम चुनाव ब्राह्मण बनाम OBC/दलित चेहरे के बीच हो सकता है. अगर ब्राह्मण चेहरा चुना गया तो ब्राह्मणों की नाराज़गी को शांत किया जा सकता है. वहीं ओबीसी/दलित चेहरा सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन को चुनौती देगा.
इन नामों की है सबसे ज्यादा चर्चा
ब्राह्मण चेहरे के रूप में-
दिनेश शर्मा (पूर्व डिप्टी सीएम, राज्यसभा सदस्य)
हरीश द्विवेदी (भाजपा नेता)
गोविंद नारायण शुक्ला (राज्य महासचिव, MLC)
OBC/दलित चेहरे के रूप में-
धर्मपाल सिंह (OBC, मंत्री)
बीएल वर्मा (केन्द्रीय मंत्री)
स्वतंत्र देव सिंह (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, OBC)
बाबूराम निषाद (MP)
यूपी में जातीय समीकरण
2017 और 2022 के चुनावों का अनुभव दिखाता है कि OBC प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में पार्टी को फायदा हुआ है. जैसे केशव प्रसाद मौर्य और स्वतंत्र देव सिंह की नियुक्ति गयी थी.
लेकिन सपा का PDA फॉर्मूला भाजपा के लिए चुनौती बन रहा है. यानि फोकस इस पर भी होगा कि नया अध्यक्ष इस लाइन को तोड़ने की क्षमता रखे.
इटावा की घटना का सियासत में असर
इटावा में ब्राह्मण कथावाचक के साथ अभद्रता की घटना पर भाजपा और सपा में आरोप-प्रत्यारोप हुआ. भाजपा ने इसे सियासी षड्यंत्र बताया जबकि सपा ने इसे जातिगत विभाजन करार दिया. इस बीच ब्राह्मण वर्ग में नाराज़गी का फायदा उठाने के लिए भाजपा ब्राह्मण चेहरे पर विचार कर सकती है.
तालमेल बनाए रखने की ज़रूरत
नया प्रदेश अध्यक्ष संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाये रखने के लिए बेहद ज़रूरी होगा. इसके साथ ही पार्टी केंद्रीय नेतृत्व को भी संतुष्ट रखने की रणनीति बनाएगी. वहीं नया प्रदेश अध्यक्ष तय होने के बाद ही भाजपा की रणनीति 2027 विधानसभा और स्थानीय चुनावों की दिशा साफ़ करेगी.