उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग को नए सिरे से मजबूत करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में सरकार ने डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े प्रतीकों और स्थलों पर खास ध्यान देना शुरू किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा आंबेडकर की मूर्तियों पर छतरियां लगाने और पार्कों के सौंदर्यीकरण का ऐलान इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह कदम दलित अस्मिता से जुड़े मुद्दों को सीधे संबोधित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
दलित प्रेरणा स्थल पर बड़ा खर्च
सीएम के ऐलान के तुरंत बाद नोएडा सेक्टर-95 स्थित दलित प्रेरणा स्थल की मरम्मत के लिए 107 करोड़ रुपये से ज्यादा के बजट को मंजूरी दी गई। अब इस स्थल के रखरखाव की जिम्मेदारी नोएडा अथॉरिटी संभालेगी। लंबे समय से उपेक्षित माने जा रहे इस स्थल पर अचानक इतना बड़ा खर्च चुनावी टाइमिंग को देखते हुए राजनीतिक संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इससे यह संकेत देने की कोशिश है कि सरकार दलित महापुरुषों और उनकी विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर है।
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दलित वोटबैंक पर सभी दलों की नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगभग 22 फीसदी दलित वोटबैंक बेहद अहम माना जाता है। इसी आधार पर बसपा सुप्रीमो मायावती चार बार सत्ता तक पहुंचीं। लेकिन अब यह वोटबैंक बिखरता दिख रहा है, जिस पर बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस सभी की नजर है। चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी कांशीराम की विरासत के सहारे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में दलित मतदाताओं को साधने की होड़ तेज हो गई है।
पीडीए के जवाब में नई रणनीति
2024 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बीजेपी को नुकसान पहुंचाया था। अब बीजेपी इसी समीकरण को तोड़ने के लिए दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। आरएसएस सामाजिक समरसता पर काम कर रहा है, वहीं सरकार दलित महापुरुषों से जुड़े स्थलों के विकास के जरिए भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है। साफ है कि यह केवल विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि 2027 के चुनावी समीकरण को साधने की बड़ी राजनीतिक रणनीति भी है।