आगरा। धूप से दूरी, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स और फास्ट फूड के बेतहाशा सेवन से पांच से 10 साल के बच्चों की हड्डियां कमजोर हो रही हैं। जिसकी वजह से बच्चों के पैरों में टेढ़ापन आ रहा है। ऐसे ही 35 से 40 साल की आयु में घुटने और हड्डियों में दर्द की समस्या बढ़ रही है। ऐसी ही तमाम बातों पर आगरा के एक होटल में आयोजित यूपी ओर्थोकॉन (गोल्डन जुबली) में पहले दिन अस्थि रोग विशेषज्ञों ने चर्चा की। इस दौरान अस्थि रोग विशेषज्ञों के एआई की सहायता से रोबोटिक घुटना प्रत्यारोपण पर भी चर्चा की गई।
यूपी ओर्थोकॉन (गोल्डन जुबली) का तीन दिवसीय आयोजन आगरा के एक होटल में चल रहा है। आयोजन सचिव डॉ. अमृत गोयल ने बताया कि देशभर से करीब एक हजार अस्थि रोग विशेषज्ञ गोल्डन जुबली कॉन्फ्रेंस में प्रतिभाग कर रहे हैं। कॉन्फ्रेंस में दिल्ली के सफदरजंग के चाइल्ड आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. विकास गुप्ता ने बताया कि वर्तमान समय बच्चे घर और स्कूल दोनों जगह एसी में रहते हैं। जिसकी वजह से बच्चों का धूप में खेलना और बैठना बंद हो गया है। साथ ही दूध और दही से ज्यादा कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन खूब करते हैं। दाल रोटी और हरी सब्जियों से ज्यादा बच्चे पिज्जा, बर्गर का सेवन करते हैं। बच्चों की यही बैड फूड हैबिट उनकी हड्डियों को कमजोर बना रही है।
बैड फूड हैबिट से ही बच्चों को विटामिन डी के साथ ही कैल्शियम और विटामिन बी की सही डोज नहीं मिलती है। विटामिन डी, विटामिन बी और कैल्शियम की कमी से पांच साल की आयु के बच्चों की हड्डियां कमजोर हो रही हैं। उनके पैरों में टेढ़ापन आ रहा है। बच्चों के पैरों में टेढ़ापन का इलाज साफ्टवेयर आधारित तकनीक और सिक्स एक्सिस हेक्सापॉड उपकरण से करना पड़ रहा है।
सर्जरी के रोबोटिक एआई की मदद
उत्तर प्रदेश ओर्थोपेडिक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. पियूष कुमार मिश्रा ने अस्थि रोग में एआई के इस्तेमाल पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कई ऐसे एआई बेस्ड एप हैं। जिसमें एक्सरे अपलोड करने पर माइनर फ्रैक्चर का पता चल जाता है। जिनसे मरीजों के घुटने खराब हो सकते हैं। इस बारे में भी एआई की मदद से पता चल रहा है। थ्री डी प्रिंटिंग की मदद से इम्प्लांट का आकार भी एआई की मदद से निर्धारित किया जा रहा है। सर्जरी के रोबोटिक एआई की मदद ली जा रही है।
डॉक्टर की जगह नहीं ले रहा, मदद कर रहा एआई
डॉ. पियूष कुमार मिश्रा ने बताया कि हर क्षेत्र में एआई आ रहा है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है। चिकित्सकीय पेशे में एआई कभी डॉक्टर्स की जगह नहीं ले रहा है और न ही ले सकता है। यह डॉक्टर्स की मदद कर रहा है। इसे बीमारी को डायग्नोज करने, प्री ऑपरेटिव, ऑपरेशन के दौरान, पोस्ट ऑपरेटिव मदद मिल रही है।