UP Government Job Rules : उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए चरित्र सत्यापन के नियम सख्त किए गए हैं। नई व्यवस्था के तहत हिंसक गतिविधियों में शामिल होने और हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने की कोशिश करने वाले लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है। इसी फैसले को लेकर अब सियासी घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने योगी सरकार पर युवाओं को डराने का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार नई पीढ़ी यानी Gen-Z को आंदोलन करने पर देशद्रोही ठहराने की कोशिश कर रही है। वहीं, सपा ने इस आदेश की तुलना अंग्रेजों के शासन से की है। हालांकि, नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने से कोई अभ्यर्थी अपने आप नौकरी के लिए अयोग्य नहीं हो जाएगा।
कांग्रेस बोली- युवाओं को डराने से नहीं रुकेगा आंदोलन
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने सरकार के फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव में हार के डर से युवाओं को हिंसा के नाम पर देशद्रोही ठहराने पर तुली हुई है। राजपूत ने कहा कि सरकार आंदोलन करने वाले युवाओं को नौकरी से वंचित करने की चेतावनी देकर डराना चाहती है। उन्होंने अंग्रेजों का जिक्र करते हुए कहा कि जब अंग्रेज भारतीयों को नहीं डरा सके, तो मौजूदा सरकार भी युवाओं की आवाज नहीं दबा पाएगी। कांग्रेस प्रवक्ता ने साफ कहा कि उनकी पार्टी इस सोच का विरोध करेगी। उनके बयान के बाद सरकारी नौकरी के नए नियमों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
सपा ने बताया अंग्रेजों के शासन जैसा आदेश
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता उदयवीर ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे ब्रिटिश शासन के दौर की याद दिलाने वाला आदेश बताया। उदयवीर का कहना है कि स्वतंत्र भारत में विरोध करना लोगों का संवैधानिक अधिकार है और सत्ता में बदलाव चुनाव जैसी कानूनी प्रक्रिया के जरिए होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार डराने-धमकाने की मानसिकता से काम कर रही है। सपा का मानना है कि ऐसे नियमों का असर युवाओं के विरोध करने के अधिकार पर पड़ सकता है। पार्टी ने सरकार की नीति की आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से गलत बताया है।
किन लोगों पर लागू होंगे नए नियम?
नई व्यवस्था के तहत ऐसे लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है, जो हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने की कोशिश करने वाले संगठनों से जुड़े हों। चरित्र सत्यापन में गंभीर अपराधों और हिंसक गतिविधियों से संबंधित जानकारी को भी महत्व दिया जाएगा। नियमों में उम्र और गतिविधियों की समय-सीमा का उल्लेख है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 21 साल की उम्र पूरी करने के बाद जांच की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर ऐसी गतिविधियों में भाग लेने को सक्रियता का संकेत माना जा सकता है। हालांकि, नियमों में यह भी कहा गया है कि इस अवधि में व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव के ठोस प्रमाण सामने आने पर उन्हें ध्यान में रखा जा सकता है।
पुलिस को 30 दिन में देनी होगी रिपोर्ट
नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी निर्देशों के मुताबिक, पुलिस को चरित्र सत्यापन की रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर देनी होगी। यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश के विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों की भर्तियों पर लागू होने की बात कही गई है। केवल एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने से किसी अभ्यर्थी को अपने आप अयोग्य नहीं माना जाएगा, लेकिन संबंधित मामले की जांच की जा सकती है। पहले से सरकारी सेवा में काम कर रहे कर्मचारियों का नए सिरे से सत्यापन नहीं होगा। हालांकि, उनके पिछले विभाग से जानकारी ली जा सकती है। इस तरह भर्ती प्रक्रिया में चरित्र सत्यापन को लेकर नए प्रावधान लागू किए गए हैं।
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युवाओं के अधिकार और नौकरी पर बढ़ी बहस
सरकार के इस फैसले ने नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं और राजनीतिक दलों के बीच बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार की व्यवस्था हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों को सरकारी सेवा से दूर रखने पर जोर देती है, तो दूसरी तरफ विपक्ष को आशंका है कि इसका इस्तेमाल आंदोलन करने वाले युवाओं को डराने के लिए हो सकता है। नियमों में शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों और हिंसा के बीच अंतर किया गया है। ऐसे में इसके वास्तविक असर का पता इस बात से चलेगा कि चरित्र सत्यापन के दौरान इन प्रावधानों को कैसे लागू किया जाता है। फिलहाल सपा और कांग्रेस ने सरकार के फैसले का विरोध किया है और यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।