उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। ग्राम प्रधानों का 5 साल का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, लेकिन अभी तक चुनाव की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है। ऐसे में सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है कि पंचायतों का संचालन कैसे जारी रखा जाए। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही है कि चुनाव होने तक मौजूदा व्यवस्था को किसी वैकल्पिक मॉडल के जरिए चलाया जाए, ताकि गांवों में विकास कार्य और प्रशासनिक कामकाज प्रभावित न हों।
चुनाव में देरी की बड़ी वजह
पंचायत चुनाव समय पर न होने के पीछे कई अहम कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन न होना है, जिसके बिना आरक्षण तय करना संभव नहीं है। इसके अलावा मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया भी अभी अधूरी है। पहले जो मतदाता सूची 22 अप्रैल को आनी थी, अब उसे 10 जून तक जारी करने की बात कही जा रही है। इन तकनीकी और प्रशासनिक कारणों की वजह से तय समय पर चुनाव कराना मुश्किल माना जा रहा है।
प्रशासक नहीं, समिति का प्लान
ऐसी स्थिति में सरकार सिर्फ प्रशासक नियुक्त करने के बजाय एक प्रशासक समिति बनाने के विकल्प पर विचार कर रही है। पंचायती राज विभाग के नियमों के तहत आमतौर पर एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता है, लेकिन इस बार ज्यादा लोकतांत्रिक मॉडल अपनाने की तैयारी है। प्रस्ताव है कि इस समिति में ग्राम प्रधान, पंचायत सदस्य और प्रशासनिक अधिकारी शामिल होंगे, ताकि गांव स्तर पर संतुलन बना रहे और फैसले स्थानीय जरूरतों के अनुसार लिए जा सकें।
प्रधानों को मिल सकता है रोल
सबसे खास बात यह है कि इस संभावित समिति का नेतृत्व खुद मौजूदा ग्राम प्रधान को दिया जा सकता है। इससे एक तरफ प्रशासनिक निरंतरता बनी रहेगी और दूसरी तरफ प्रधानों में नाराजगी भी कम होगी। कई ग्राम प्रधान संगठनों ने पहले ही मांग उठाई है कि अगर चुनाव समय पर नहीं हो पा रहे हैं तो उनका कार्यकाल बढ़ाया जाए। उनका तर्क है कि कोरोना काल के कारण उनका कार्यकाल पूरी तरह प्रभावी नहीं रहा, इसलिए उन्हें अतिरिक्त समय मिलना चाहिए।
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कानूनी पहलू भी अहम
इस पूरे मामले में अदालत की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। हाईकोर्ट पहले ही चुनाव में देरी को लेकर सख्त सवाल उठा चुका है और आगे की सुनवाई में सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा जा सकता है। पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी साफ किया है कि आगे का फैसला कानून और अदालत के रुख के अनुसार लिया जाएगा। यानी सरकार कोई भी कदम कानूनी सलाह के बाद ही उठाएगी।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी है। अगर चुनाव टलते हैं और प्रशासक समिति लागू होती है तो यह पंचायत व्यवस्था में एक नया मॉडल साबित हो सकता है। इससे गांवों में कामकाज चलता रहेगा और राजनीतिक संतुलन भी बना रहेगा। लेकिन यह भी साफ है कि पंचायत चुनाव जितना देर से होंगे, उतना ही सियासी समीकरण भी बदल सकते हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि गांव की सत्ता किसके हाथ में रहेगी और कब तक।