भारत में डिजिटल पेमेंट का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका यूपीआई अब नई बहस के केंद्र में है। अगर इस पर ट्रांजैक्शन फीस लागू होती है, तो इसका सीधा असर करोड़ों यूजर्स पर पड़ सकता है। एक ताजा सर्वे ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है, जिससे डिजिटल इकोनॉमी पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सर्वे में बड़ा खुलासा
लोकलसर्किल्स के सर्वे के मुताबिक, करीब 70 से 75 प्रतिशत यूजर्स UPI का इस्तेमाल बंद कर सकते हैं अगर इस पर फीस लगाई जाती है। सिर्फ 25 प्रतिशत लोग ही ऐसे होंगे जो भुगतान जारी रखेंगे। यह आंकड़ा बताता है कि लोग मुफ्त डिजिटल लेनदेन को कितना महत्व देते हैं और फीस लगने पर उनका भरोसा तेजी से टूट सकता है।
MDR को लेकर बहस तेज
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया ने बड़े व्यापारियों पर 0.3 प्रतिशत MDR लगाने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम को सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने के लिए निवेश जरूरी है। फिलहाल जीरो MDR के कारण कंपनियों को सीधी कमाई नहीं होती, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है।
कंपनियों पर बढ़ा दबाव
गूगल पे, फोनपे और पेटीएम जैसी कंपनियां बड़ी संख्या में ट्रांजैक्शन संभालती हैं, लेकिन उन्हें इससे सीधा फायदा नहीं मिलता। टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च के बावजूद इन प्लेटफॉर्म्स को रेवेन्यू के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।
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सरकार का साफ रुख
सरकार ने साफ कर दिया है कि UPI पर ट्रांजैक्शन फीस लगाने की खबरें भ्रामक हैं। 2020 से लागू जीरो MDR नीति का उद्देश्य डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना है। सरकार नहीं चाहती कि आम यूजर्स पर कोई अतिरिक्त बोझ पड़े, जिससे डिजिटल ट्रांजैक्शन की रफ्तार धीमी हो।
यूजर्स की चिंता क्या है
अगर फीस लागू होती है, तो छोटे लेनदेन करने वाले यूजर्स सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए UPI का इस्तेमाल करने वाले लोग नकद भुगतान की ओर लौट सकते हैं, जिससे डिजिटल इंडिया मिशन को झटका लग सकता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल UPI पर कोई शुल्क लागू नहीं है, लेकिन MDR को लेकर चर्चा जारी है। आने वाले समय में सरकार, कंपनियों और यूजर्स के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। यह तय करेगा कि डिजिटल पेमेंट का भविष्य कितना मजबूत और टिकाऊ रहेगा।