अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते का असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों पर भी इसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने और ईरानी तेल निर्यात पर संभावित राहत से भारत को सस्ता कच्चा तेल, कम आयात बिल और चाबहार पोर्ट परियोजना में नई गति मिलने की उम्मीद है।
होर्मुज खुलने से तेल आपूर्ति होगी सामान्य
समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की घोषणा की गई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल और एलएनजी व्यापार का प्रमुख रास्ता है। बीते महीनों में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ गया था। अब इस मार्ग के खुलने से तेल आपूर्ति सामान्य होने की संभावना है।
भारत के तेल आयात बिल में आ सकती है कमी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। यदि ईरानी तेल फिर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आता है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव घट सकता है।
महंगाई और रुपये को मिलेगा सहारा
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा असर महंगाई पर पड़ सकता है। ईंधन सस्ता होने से परिवहन और उत्पादन लागत कम होगी, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होने से भारतीय रुपये को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
चाबहार पोर्ट और व्यापारिक परियोजनाओं को मिलेगी गति
ईरान में भारत द्वारा विकसित चाबहार पोर्ट परियोजना को भी इस समझौते से बड़ा फायदा हो सकता है। अमेरिका और ईरान के रिश्तों में नरमी आने से इस परियोजना पर दबाव कम होगा और नए निवेश के रास्ते खुल सकते हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए भारत, मध्य एशिया और यूरोप के साथ व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की दिशा में भी तेजी आ सकती है।