पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच जारी उच्चस्तरीय वार्ता ने मिडिल ईस्ट की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू हुई यह बातचीत कई संवेदनशील मुद्दों पर आकर अटकती नजर आ रही है। लेबनान संकट, आर्थिक प्रतिबंध और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के बीच दूरी और बढ़ा दी है, जिससे समझौते की राह कठिन दिख रही है।
लेबनान युद्ध और क्षेत्रीय तनाव
वार्ता का सबसे बड़ा मुद्दा लेबनान में जारी संघर्ष है। ईरान का कहना है कि जब तक लेबनान में युद्धविराम लागू नहीं होता, वह औपचारिक समझौते पर आगे नहीं बढ़ेगा। वहीं अमेरिका इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा अलग मामला बताता है। इस टकराव ने बातचीत को शुरुआती चरण में ही जटिल बना दिया है।
आर्थिक प्रतिबंध और संपत्ति विवाद
ईरान लगातार अमेरिका से अपने फ्रीज किए गए फंड और आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है। प्रतिबंधों के कारण ईरानी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। हालांकि अमेरिका का रुख सख्त है और वह किसी भी राहत के बदले परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों में कटौती की शर्त रख रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण की जंग
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी बातचीत का अहम केंद्र बना हुआ है। ईरान इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण और टोल व्यवस्था चाहता है, जबकि अमेरिका चाहता है कि वैश्विक तेल आपूर्ति बिना किसी बाधा के जारी रहे। यह मुद्दा वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर विवाद
अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पर रोक चाहते हैं, लेकिन ईरान इसे अपना संप्रभु अधिकार बताता है। इसी तरह मिसाइल क्षमता को कम करने की मांग भी ईरान लगातार खारिज कर रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और बढ़ रहा है।
सेना वापसी और युद्ध खत्म करने की मांग
ईरान चाहता है कि अमेरिका क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करे और सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त हो। लेकिन अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जब तक स्थायी शांति समझौता नहीं होता, तब तक सेना की मौजूदगी बनी रहेगी। इसी मुद्दे पर अंतिम सहमति बनना सबसे कठिन माना जा रहा है।