US Iran Tensions : मिडिल ईस्ट में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल जरूरत के लिए अहम माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। निवेशकों को डर है कि अगर संघर्ष लंबा चला या इस अहम समुद्री मार्ग पर सप्लाई प्रभावित हुई तो तेल की कीमतों में और बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
90 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की खबरों के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 3 फीसदी चढ़कर एक बार फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। खबर लिखे जाने तक ब्रेंट क्रूड 90.15 डॉलर और WTI क्रूड 85.20 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। वहीं, Murban Crude में 4 फीसदी से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई और यह करीब 95.75 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
होर्मुज स्ट्रेट पर क्यों टिकी दुनिया की नजर
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या आवाजाही में रुकावट से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका की ओर से ईरान के एक द्वीप पर कार्रवाई के बाद तेहरान की तरफ से भी जवाबी कार्रवाई की गई। ऐसे में बाजार को आशंका है कि तनाव का अगला दौर तेल आपूर्ति के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।
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कितने दिन चलेगा तनाव, कोई साफ जवाब नहीं
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक मौजूदा हालात कितने समय तक जारी रहेंगे, इसे लेकर फिलहाल निश्चित अनुमान लगाना मुश्किल है। IG मार्केट के विश्लेषक टोनी सिकामोर के मुताबिक यह तनाव बढ़ने के एक और दौर जैसा नजर आ रहा है और इसका असर कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकता है। संघर्ष बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।
भारत पर पड़ेगा सीधा असर
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर भारत पर भी पड़ सकता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर भी दबाव आ सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल के साथ परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित होने का खतरा रहता है। महंगे ईंधन का असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत में महंगाई और आम लोगों के खर्च से जुड़ा बड़ा जोखिम भी बन सकता है।