अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। संघर्ष तेज होने और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े जोखिमों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तथा तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर या उससे ऊपर तक पहुंच सकती हैं, जिसका असर भारत समेत कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
तनाव बढ़ने के साथ फिर गरमाया तेल बाजार
मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है। दोनों देशों के बीच तनाव गहराने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर सवाल उठने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। हाल के दिनों में तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। ऊर्जा बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कीमतों में और तेजी आ सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा खतरा, सप्लाई पर मंडराया संकट
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को लेकर फिर से अनिश्चितता बढ़ गई है। जहाजों पर हमलों और सैन्य गतिविधियों के बाद वैश्विक बाजार में आशंका है कि यदि इस मार्ग पर आवाजाही प्रभावित हुई, तो दुनिया के कई देशों तक कच्चे तेल की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि ऊर्जा बाजार में निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
120 डॉलर से 150 डॉलर तक पहुंचने की आशंका
ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और गहराता है तथा तेल आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से आगे भी जा सकती हैं। कुछ अंतरराष्ट्रीय आकलनों में यह संभावना जताई गई है कि गंभीर आपूर्ति संकट की स्थिति में कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। हालांकि, यह पूरी तरह संघर्ष की दिशा और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होने पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की लागत बढ़ सकती है। इसके साथ ही परिवहन खर्च बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।
महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ सकती है चुनौती
यदि मध्य पूर्व में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। तेल महंगा होने से आयात लागत बढ़ेगी, जिससे कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। वैश्विक व्यापार, परिवहन और औद्योगिक उत्पादन पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर अब अमेरिका-ईरान के बीच आगे की परिस्थितियों और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति पर बनी हुई है।