US LASER WEAPON: अमेरिका ने ड्रोन और क्रूज मिसाइलों से निपटने के लिए हाई-एनर्जी लेजर सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर नई जानकारी सामने रखी है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक इंटरसेप्टर मिसाइल की तरह हर बार महंगा गोला-बारूद खर्च नहीं होता, बल्कि बिजली की मदद से लेजर बीम को लक्ष्य पर केंद्रित किया जाता है। अमेरिका समुद्री क्षेत्र के साथ दक्षिणी सीमा पर ड्रोन के खिलाफ भी इस तकनीक की क्षमता परख रहा है।
ड्रोन और मिसाइलों को निशाना बनाने की कोशिश
अमेरिकी सैन्य बलों के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्र में ड्रोन और आने वाली क्रूज मिसाइलों के खतरे से निपटने के लिए लेजर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। पारंपरिक इंटरसेप्टर की तुलना में लेजर सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत इसकी संभावित कम लागत बताई जाती है। इससे लंबे समय तक हवाई खतरों के खिलाफ रक्षा करने की क्षमता बढ़ सकती है।
आखिर कैसे काम करता है लेजर हथियार?
हाई-एनर्जी लेजर सिस्टम एक बेहद शक्तिशाली किरण को लक्ष्य पर केंद्रित करता है। लगातार एक ही जगह ऊर्जा पहुंचने से लक्ष्य की बाहरी संरचना या संवेदनशील हिस्सों को नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर ड्रोन और कुछ कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है। सिस्टम के लिए मुख्य जरूरत पर्याप्त विद्युत ऊर्जा और लक्ष्य को सटीक तरीके से ट्रैक करना है।
मिसाइल के मुकाबले लागत में बड़ा अंतर
लेजर हथियारों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उनकी ऑपरेशनल लागत की वजह से हो रही है। पारंपरिक इंटरसेप्टर मिसाइलों में हर लक्ष्य के लिए अलग मिसाइल इस्तेमाल करनी पड़ती है, जबकि लेजर सिस्टम में शॉट के लिए मुख्य खर्च बिजली से जुड़ा होता है। अमेरिकी सेना ने वार-रेडी हाई-एनर्जी लेजर सिस्टम के लिए बड़ा ठेका भी दिया है, जिससे इस तकनीक को लेकर बढ़ते सैन्य निवेश का संकेत मिलता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों अहम है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के प्रमुख समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी सैन्य तनाव का असर समुद्री सुरक्षा के साथ ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। ऐसे इलाके में ड्रोन और मिसाइलों से निपटने के लिए कम लागत वाली रक्षा प्रणाली की जरूरत महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेजर सिस्टम इसी दिशा में एक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
दक्षिणी सीमा पर भी ड्रोन के खिलाफ परीक्षण
अमेरिका अपनी दक्षिणी सीमा पर भी छोटी ड्रोन के खिलाफ लेजर तकनीक की क्षमता परख रहा है। वहां ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और तस्करी जैसी गतिविधियों में होने की चिंता जताई जाती रही है। कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन को जल्दी पहचानना और सटीक तरीके से रोकना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में लेजर सिस्टम को एक संभावित विकल्प के तौर पर विकसित किया जा रहा है।