अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 30 साल बाद अमेरिका में फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करने का आदेश देकर दुनिया को चौंका दिया है। ट्रंप के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय हलकों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यह वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण के खिलाफ माना जा रहा है। रूस और चीन की हालिया गतिविधियों के बीच ट्रंप के इस आदेश की टाइमिंग ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं — क्या अमेरिका अब नई परमाणु दौड़ की शुरुआत करने जा रहा है?
तीन दशक बाद फिर गूंजेगा अमेरिकी परमाणु परीक्षण
डोनाल्ड ट्रंप ने रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया है कि अमेरिका अपने परमाणु हथियारों की टेस्टिंग तुरंत शुरू करे। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह परीक्षण चीन और रूस के बराबर स्तर पर होने चाहिए। अमेरिका ने आखिरी बार 23 सितंबर 1992 को नेवादा में परमाणु परीक्षण किया था। उसके बाद भूमिगत परीक्षणों पर रोक लगा दी गई थी, जिसे अब ट्रंप ने तोड़ने का संकेत दिया है।
रूस और चीन की गतिविधियों से बढ़ा दबाव
ट्रंप का यह आदेश ऐसे समय में आया है जब रूस ने हाल ही में इंटरकांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल (ICBM) यार्स और सिनेवा का परीक्षण किया है। वहीं चीन भी तेजी से अपने परमाणु हथियारों का भंडार बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक चीन के पास करीब 1,000 परमाणु हथियार हो सकते हैं। इस बीच, ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात के तुरंत बाद यह आदेश जारी होना कई रणनीतिक संकेत दे रहा है।
वैश्विक चिंता और NPT उल्लंघन का खतरा
परमाणु परीक्षण का यह आदेश न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) का उल्लंघन माना जा सकता है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम वैश्विक हथियारों की नई दौड़ को जन्म दे सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे अमेरिका और रूस के बीच तनाव और बढ़ेगा और परमाणु सुरक्षा का संतुलन बिगड़ सकता है।
क्या ट्रंप डर रहे हैं रूस और चीन से?
ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका के पास दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं, लेकिन रूस और चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए यह कदम जरूरी है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रंप की रणनीतिक चाल भी हो सकती है, जिससे वे चुनावी साल में अपनी सख्त छवि पेश करना चाहते हैं। अब दुनिया की निगाहें इस बात पर हैं कि क्या अमेरिका सच में परमाणु परीक्षण करेगा या यह सिर्फ चेतावनी है।