मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत कर दिया है। परमाणु ऊर्जा से चलने वाला विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर USS George H. W. Bush (CVN-77) अब इस क्षेत्र में पहुंच चुका है। इसकी तैनाती से न केवल अमेरिकी नौसेना की ताकत बढ़ी है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन पर भी इसका बड़ा असर पड़ सकता है। यह कदम रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती
मिडिल ईस्ट में अब United States के तीन बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर मौजूद हैं, जिससे उसकी सैन्य पकड़ और मजबूत हो गई है। USS George H. W. Bush (CVN-77) अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर इस क्षेत्र में पहुंचा, ताकि जोखिम भरे समुद्री रास्तों से बचा जा सके। इस तैनाती को अमेरिका की रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
फ्लोटिंग एयरबेस की ताकत
यह कैरियर किसी चलते-फिरते एयरबेस की तरह काम करता है। USS George H. W. Bush (CVN-77) पर करीब 90 तक लड़ाकू विमान तैनात किए जा सकते हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर तक हमले करने में सक्षम हैं। इसकी मौजूदगी से बिना किसी स्थायी बेस के भी हवाई ऑपरेशन संभव हो जाते हैं।
परमाणु ऊर्जा से चलने वाली शक्ति
इस सुपर कैरियर की सबसे बड़ी खासियत इसका परमाणु ऊर्जा से संचालित होना है। इसमें लगे A4W रिएक्टर इसे लंबे समय तक बिना ईंधन भरे संचालन की क्षमता देते हैं। करीब 1 लाख टन वजनी यह जहाज महीनों नहीं बल्कि सालों तक समुद्र में सक्रिय रह सकता है, जो इसे बेहद घातक और प्रभावी बनाता है।
हजारों कर्मियों का चलता-फिरता शहर
इस जहाज पर करीब 5000 से ज्यादा लोग तैनात रहते हैं, जिनमें नाविक और एयर विंग के सदस्य शामिल हैं। USS George H. W. Bush (CVN-77) न केवल सैन्य ताकत का प्रतीक है, बल्कि यह एक पूरी तरह से सुसज्जित तैरता हुआ शहर भी है, जिसमें हर जरूरी सुविधा मौजूद होती है।
क्षेत्रीय संतुलन पर असर
मिडिल ईस्ट में इस तरह की भारी सैन्य तैनाती से तनाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। Middle East पहले से ही संवेदनशील क्षेत्र है, जहां इस कदम का असर कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर देखने को मिल सकता है। आने वाले समय में यह तैनाती किस दिशा में घटनाक्रम को मोड़ेगी, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।