उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून के चर्चित अनुपमा गुलाटी हत्याकांड में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए बड़ा संदेश दिया है। अदालत ने साफ कर दिया कि इस जघन्य अपराध में दोषी सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजेश गुलाटी को उम्रकैद की सजा से कोई राहत नहीं मिलेगी। राजेश ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी, लेकिन करीब आठ साल चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की डबल बेंच ने उसकी अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि निचली अदालत का फैसला पूरी तरह तथ्यों और सबूतों पर आधारित है।
कैसे सामने आया खौफनाक सच
यह मामला दिसंबर 2010 में तब सामने आया, जब अनुपमा के भाई को उसकी कोई खबर नहीं मिली। जांच में सामने आया कि 17 अक्टूबर 2010 की रात पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। गुस्से में राजेश ने अनुपमा को थप्पड़ मारा, जिससे वह बेहोश हो गई। शिकायत के डर से उसने पत्नी की निर्ममता से हत्या कर दी। इसके बाद राजेश ने इलेक्ट्रिक आरी और डीप फ्रीजर खरीदा, शव के 72 टुकड़े किए और उन्हें प्लास्टिक बैग में फ्रीजर में छिपा दिया। बाद में वह इन टुकड़ों को देहरादून के अलग-अलग इलाकों में फेंकता रहा।
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निचली अदालत का फैसला और जुर्माना
सितंबर 2017 में देहरादून की अदालत ने राजेश गुलाटी को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही उस पर 15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि 70 हजार रुपये सरकारी खजाने में जमा होंगे, जबकि बाकी रकम अनुपमा के बच्चों के वयस्क होने तक बैंक में सुरक्षित रखी जाएगी। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और कहा कि यह अपराध समाज को झकझोर देने वाला है।
लव स्टोरी से मर्डर मिस्ट्री तक
राजेश और अनुपमा की मुलाकात 1992 में हुई थी और सात साल के रिश्ते के बाद 1999 में दोनों ने शादी की। अमेरिका में नौकरी और फिर भारत वापसी के बाद रिश्ते में दरार बढ़ती गई। घरेलू विवाद कोर्ट तक पहुंचा और भरण-पोषण के आदेश भी हुए। लेकिन 2010 की एक रात ने सब कुछ खत्म कर दिया। बच्चों से मां की सच्चाई छिपाने की कोशिश भी नाकाम रही और आखिरकार पुलिस के सामने पूरा सच उजागर हो गया। हाईकोर्ट के फैसले के साथ यह साफ हो गया है कि इस जघन्य अपराध में दोषी को कानून से राहत नहीं मिलेगी।