वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर जहां संसद में उत्साह दिखा, वहीं बाहर राजनीति गरमा गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि उन्हें वंदे मातरम पढ़ने पर आपत्ति नहीं, लेकिन इसके अर्थ में पूजा का भाव आने से मुसलमान इसे धार्मिक रूप से स्वीकार नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करता है और उसकी उपासना में किसी अन्य तत्व को शामिल नहीं कर सकता। मदनी ने दावा किया कि वंदे मातरम के कुछ श्लोक देश को देवी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो इस्लाम के सिद्धांत से मेल नहीं खाता।
संविधान का हवाला और धार्मिक स्वतंत्रता
अरशद मदनी ने स्पष्ट किया कि किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ कोई गीत या नारा बोलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत हर नागरिक को अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने कहा कि वतन से प्रेम करना एक भाव है, लेकिन उसकी पूजा करना धार्मिक दृष्टि से अलग विषय है, इसलिए इस मुद्दे को संवेदनशीलता से संभाला जाना चाहिए। मदनी का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
ओवैसी का तीखा हमला और नई बहस
इस मुद्दे पर AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी संसद में सरकार पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आजादी इसलिए मिली क्योंकि देश ने धर्म और राष्ट्र को एक नहीं माना। ओवैसी के अनुसार देशभक्ति का प्रमाण किसी गीत से नहीं, बल्कि जनता की समस्याएं हल करने से दिखता है। उन्होंने कहा कि गरीबी घटाना, विकास बढ़ाना और अवसर देना ही असली देशसेवा है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी को वंदे मातरम बोलने के लिए मजबूर करना संविधान के खिलाफ साबित होगा।
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सियासत में बढ़ती दूरी और आगे की तस्वीर
ओवैसी ने कहा कि जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया, आज वे देशभक्ति का प्रमाण मांग रहे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या वंदे मातरम को वफादारी का टेस्ट बनाना है। ओवैसी ने साफ कहा कि इस्लाम में इबादत केवल अल्लाह की होती है, न मां की, न किसी अन्य प्रतीक की। संसद से लेकर सड़क तक अब बहस तेज हो गई है कि देशभक्ति की परिभाषा क्या हो और किसी गीत को राष्ट्रीय पहचान के रूप में किस हद तक लागू किया जाए। सरकार की अगली प्रतिक्रिया का सभी को इंतजार है, क्योंकि मामला भावनाओं और संविधान दोनों से जुड़ा है।