Vat Purnima 2026: वट पूर्णिमा का पर्व हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं तथा बरगद (वट) के वृक्ष की विधिवत पूजा करती हैं। पूजा के दौरान बरगद के तने पर लाल सूत या मौली बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है? आइए जानते हैं इसका महत्व।
वट वृक्ष को क्यों माना जाता है पवित्र?
सनातन धर्म में वट वृक्ष को त्रिदेवों का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। यह वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण वट पूर्णिमा के दिन इसकी पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में स्थिरता बनी रहती है।
लाल सूत बांधने की धार्मिक मान्यता
वट पूर्णिमा के दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की परिक्रमा करते हुए उसके तने पर लाल सूत या मौली बांधती हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह लाल धागा पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और सात जन्मों के पवित्र बंधन का प्रतीक होता है। लाल रंग मंगल, शक्ति और सौभाग्य का सूचक माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि श्रद्धापूर्वक यह अनुष्ठान करने से दांपत्य जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ी है परंपरा
वट पूर्णिमा का व्रत सावित्री और सत्यवान की अमर कथा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण हरने आए, तब सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और बुद्धिमत्ता से उन्हें पुनः जीवन दिलाया। कहा जाता है कि सत्यवान बरगद के वृक्ष के नीचे ही विश्राम कर रहे थे। तभी से वट वृक्ष को सौभाग्य और अटल दांपत्य का प्रतीक माना जाने लगा तथा इसकी पूजा और लाल सूत बांधने की परंपरा प्रचलित हुई।
पूजा करते समय रखें इन बातों का ध्यान
वट पूर्णिमा की पूजा प्रातः स्नान के बाद शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। पूजा के समय बरगद के वृक्ष को जल अर्पित करें, रोली, अक्षत, पुष्प और फल चढ़ाएं तथा श्रद्धा से लाल सूत लपेटते हुए परिक्रमा करें। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण करें और परिवार की सुख-समृद्धि तथा पति की लंबी आयु की कामना करें। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।