Ujjain News : उज्जैन सिर्फ धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि समय और काल की गणना का भी केंद्र है। महाकाल की इस नगरी को विक्रम संवत की जन्मभूमि माना जाता है। यह कर्क रेखा और शून्य रेखांश पर स्थित एकमात्र स्थान है, जो पंचांग निर्माण, साधना और ज्योतिष की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिंहस्थ कुंभ का आयोजन, संस्कृत साहित्य का वैभव और कालिदास की छाया इसे और भी पावन बनाते हैं। उज्जैन की धरती धर्म, विज्ञान और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
काल-गणना और पंचांग की जन्मभूमि
उज्जैन को हिन्दू पंचांग ‘विक्रम संवत’ की जन्मस्थली कहा जाता है, जिसकी स्थापना राजा विक्रमादित्य ने की थी। यह संवत आज भी भारत के उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के साथ-साथ नेपाल में भी प्रमुखता से प्रचलित है। उज्जैन की विशेष भौगोलिक स्थिति—जहां कर्क रेखा और शून्य रेखांश एक साथ मिलते हैं—इसे पंचांग निर्माण और समय की गणना का प्रमुख स्थल बनाती है।
सिंहस्थ कुंभ और धार्मिक महत्व
हर 12 साल में सिंह राशि में बृहस्पति और मेष राशि में सूर्य के आने पर उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ आयोजित होता है। यह आयोजन मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के तट पर होता है और इसे भारत के चार प्रमुख कुंभ स्थलों में से एक माना जाता है। साथ ही, उज्जैन 51 शक्तिपीठों में शामिल होने के कारण भी अत्यंत पावन मानी जाती है।
संस्कृति और साहित्य की नगरी उज्जैन
प्राचीन काल में ‘अवन्तिका’ और ‘उज्जयिनी’ के नाम से प्रसिद्ध उज्जैन को संस्कृत के महान कवि कालिदास की नगरी माना जाता है। यहां स्थित महाकालेश्वर मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में तीसरे स्थान पर आता है और इसकी दक्षिणमुखी स्थिति इसे विशेष बनाती है। हरसिद्धि, मंगलनाथ, गणेश और काल भैरव मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल भी उज्जैन की आस्था को सशक्त बनाते हैं।