होली का नाम आते ही रंग, गुलाल और खुशियों की छटा आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन मध्य प्रदेश में एक ऐसा गांव भी है, जहाँ होली के दिन रंग नहीं उड़ते, ढोल नहीं बजते और उत्सव थम सा जाता है। यह परंपरा आस्था, करुणा और सामाजिक एकता से जुड़ी है। भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी मान्यता के कारण यहां होली का उत्सव एक दिन आगे बढ़ जाता है।
कहां है यह अनोखा गांव
यह परंपरा मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के एक छोटे से गांव में निभाई जाती है, जिसे चोली गांव कहा जाता है। यह गांव देवगढ़ नाम से भी जाना जाता है और विंध्याचल पर्वत की तलहटी में बसा है। प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक विरासत के लिए प्रसिद्ध यह गांव अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है।
क्यों नहीं खेली जाती होली
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, होली के दिन रंग न खेलने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि होली केवल आनंद का पर्व नहीं, बल्कि संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक है। इसलिए इस दिन गांव में शांति रखी जाती है, कोई रंग-गुलाल नहीं उड़ता और लोग उत्सव से दूरी बनाए रखते हैं।
शोक में डूबे परिवारों के साथ खड़ा होता है गांव
इस परंपरा का सबसे भावनात्मक पक्ष यह है कि होली के दिन गांव के लोग उन घरों में जाते हैं, जहाँ हाल के समय में किसी प्रियजन का निधन हुआ हो। वहां गुलाल लगाकर सांत्वना दी जाती है और परिवार के दुख में सहभागी बना जाता है। यह संदेश दिया जाता है कि वे अकेले नहीं हैं और पूरा गांव उनके साथ खड़ा है।
एक दिन बाद रंगों की वापसी
जब शोकाकुल परिवारों का मन हल्का हो जाता है और वे सामाजिक सहारे को महसूस करते हैं, तब अगले दिन पूरे गांव में होली धूमधाम से खेली जाती है। रंग, गुलाल और हंसी-ठिठोली के साथ उत्सव मनाया जाता है। इस तरह खुशी और संवेदना का संतुलन बनाए रखा जाता है।
समाज को जोड़ने वाली परंपरा
चोली गांव की यह अनोखी होली परंपरा केवल एक धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का उदाहरण है। यह सिखाती है कि त्योहार केवल अपने लिए खुश होने का अवसर नहीं, बल्कि दूसरों के दुख को समझने और साझा करने का भी माध्यम हैं। यही कारण है कि यह गांव आज भी अपनी इस परंपरा पर गर्व करता है।