मध्य प्रदेश के सागर जिले के पास बसा एक छोटा सा गांव इन दिनों अपनी पहचान बदलने की तैयारी में है। इस गांव का नाम है भैंसा, जो कभी इसकी पारंपरिक पशुपालन संस्कृति की पहचान हुआ करता था। लेकिन अब गांव के लोग इस नाम को लेकर असहज महसूस करने लगे हैं। उनका कहना है कि जब वे बाहर अपने गांव का नाम बताते हैं, तो या तो लोग हंसने लगते हैं या मजाक उड़ाते हैं। इसी शर्म और झिझक को खत्म करने के लिए अब गांववाले प्रशासन से नाम बदलने की औपचारिक मांग करने वाले हैं।
भैंसा नाम बना मजाक का कारण
गांव के बुजुर्ग दीनदयाल चौधरी बताते हैं कि अब यह नाम उनके लिए गर्व नहीं, बल्कि परेशानी का कारण बन गया है। वहीं, लक्ष्मीप्रसाद तिवारी का कहना है कि जब वह बच्चों के रिश्तों के लिए बाहर जाते हैं तो गांव का नाम लेते ही सामने वाला असहज हो जाता है या मजाक बनाने लगता है। युवाओं को भी अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर गांव का नाम लिखते वक्त हिचक होती है।
पहले था गौरव का प्रतीक
कभी यह गांव भैंस पालन के लिए जाना जाता था। खेतों और जंगलों में बड़ी संख्या में मवेशी चरते थे, जिससे यह नाम पड़ा। उस समय यह नाम स्थानीय गर्व का प्रतीक था, लेकिन अब बदलते समाज और आधुनिक सोच के साथ यह नाम बोझ बन गया है।
नई सोच, नई पहचान की मांग
गांववालों का कहना है कि जैसे इलाहाबाद से प्रयागराज और उरगांव से महाकालगढ़ जैसे बदलाव हुए हैं, वैसे ही उनका गांव भी नई पहचान का हकदार है। एक सकारात्मक और सम्मानजनक नाम से उन्हें समाज में आत्मविश्वास मिलेगा और नई पीढ़ी को भी गर्व होगा।